डमी अकाउंट की दलदल में बिजली विभाग
बरेली में बिजली विभाग के भीतर डमी अकाउंट के जरिए करोड़ों के राजस्व गबन का गंभीर आरोप। राजस्व सुधार की आड़ में अधिशासी अभियंताओं पर फर्जी रसीद और रकम हड़पने का खेल चलाने की बात सामने आई है।
➡️ डमी अकाउंट से करोड़ों का खेल
➡️ फर्जी रसीद, पैसा गायब
➡️ मुकदमे खत्म, राजस्व शून्य
➡️ विजिलेंस छापों का दुरुपयोग
➡️ बिजली व्यवस्था पर असर
➡️ भरोसे पर बड़ा सवाल
जन माध्यम
बरेली। बिजली महज़ एक सुविधा नहीं,आम आदमी की ज़िंदगी की सांस है। अंधेरे में डूबा घर, फूंका हुआ ट्रांसफॉर्मर, अस्पतालों की ठप मशीनें और बच्चों की बुझती आंखें यह सब किसी फाइल की एंट्री नहीं, यह एक पूरे समाज की पीड़ा है। ऐसे समय में जब पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष आशीष कुमार गोयल दिन रात एक कर निरंतर बिजली आपूर्ति, राजस्व सुधार और उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधा देने के लिए जूझ रहे हैं,वहीं बैठे कुछ अधिशासी अभियंताओं ने इस मेहनत पर ऐसा ग्रहण लगाया है, जिसे पढ़कर भी शर्म आती है।
2017 से 2025 तक,वर्टिकल सिस्टम लागू होने से पहले, विभाग के भीतर एक ऐसा सिस्टम संचालित घोटाला पनपा, जिसने न केवल पावर कॉरपोरेशन को करोड़ों के राजस्व से वंचित किया, बल्कि ईमानदार अधिकारियों की छवि और जनता के भरोसे को भी लहूलुहान कर दिया। इस खेल का नाम था डमी अकाउंट। डमी अकाउंट सुनने में तकनीकी शब्द, लेकिन हकीकत में यह एक खुली लूट की मशीन। इन अकाउंट्स का कोई स्थायी उपभोक्ता नहीं, कोई वास्तविक जवाबदेही नहीं। ये अकाउंट केवल और केवल एक मकसद से बनाए गए राजस्व को काग़ज़ों में दिखाना और असल रकम को जेब में भर लेना।
तस्वीर साफ़ समझिए। विजिलेंस टीम छापा मारती है, बिजली चोरी पकड़ी जाती है, एफआईआर दर्ज होती है। आरोपी थर थर कांपता हुआ अधिशासी अभियंता के पास पहुंचता है। कहा जाता है पांच लाख की चोरी का नोटिस मिला है, जमा कर दो, मामला खत्म। अधिशासी अभियंता रसीद काट देता है। आरोपी राहत की सांस लेता है, थाने में रसीद लगती है, मुकदमा खत्म। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती यहीं से शुरू होता है लूट का खेल,शाम होते होते या अगले दिन वही रसीद कैंसिल। पैसा सरकारी खाते में गया ही नहीं। न उपभोक्ता को खबर, न सिस्टम को। सारा खेल डमी अकाउंट के सहारे अधिशासी अभियंता की जेब में समा जाता है। सोचिए,एक एक केस में लाखों और सालों में करोड़ों! यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, यह संगठित अपराध है।
और इसका नतीजा? विभाग घाटे में। ट्रांसफॉर्मर घटिया सामग्री से जलते हैं क्योंकि असली पैसा तो सिस्टम तक पहुंचा ही नहीं। लाइनें कमजोर हैं, मेंटेनेंस ठप है, बिजली कटौती आम बात है। उपभोक्ता बिल भरता है, फिर भी अंधेरे में बैठा रहता है। बच्चे पढ़ नहीं पाते, बुज़ुर्ग गर्मी में तड़पते हैं, अस्पतालों में जनरेटर पर ज़िंदगी टिकी रहती है। लेकिन साहब लोग? वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर अगली रसीद की योजना बनाते हैं। यह सवाल बेहद सीधा है,जहां चोरी का राजस्व भी चोरी हो जाए, वहां सुधार कैसे होगा? आशीष कुमार गोयल जैसे अधिकारी अगर ऊपर से सिस्टम सुधारने में लगे हों और नीचे से अधिशासी अभियंता सिस्टम को चाट रहे हों, तो बिजली विभाग कैसे मुनाफे में आएगा? कोई अपवाद नहीं है। अगर ईमानदारी से सभी अधिशासी अभियंताओं की डमी अकाउंट ऑडिट कराई जाए, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आएंगे। करोड़ों का गबन, फर्जी रसीदें, कैंसिलेशन का पैटर्न सब कुछ बोल उठेगा। सवाल यह नहीं कि सबूत मिलेंगे या नहीं, सवाल यह है कि इच्छाशक्ति है या नहीं। यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ है जिसने सरकारी कुर्सी को निजी तिजोरी समझ लिया। यह उन ईमानदार कर्मचारियों की चीख है जो रोज़ शर्मिंदा होते हैं, और उन उपभोक्ताओं का आक्रोश है जो हर महीने बिल के साथ धोखा भी चुकाते हैं। पावर कॉरपोरेशन अध्यक्ष के ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए,डमी अकाउंट्स खत्म हों, रसीद कैंसिलेशन की पारदर्शी जांच हो, और दोषी अधिशासी अभियंताओं को उदाहरण बनाया जाए। वरना याद रखिए जब अंधेरा सिस्टम के भीतर फैल जाए, तो बिजली भी जनता को रोशनी नहीं दे पाती।