पुलिस के नाक के नीचे बेखौफ सरेंडर
डेन कैफे कांड का मुख्य आरोपी बिना डर, बिना नकाब अदालत पहुंचा
➡️ डेन कैफे कांड का मुख्य आरोपी ऋषभ ठाकुर कोर्ट में सरेंडर
➡️ पुलिस तलाश करती रही, आरोपी बेखौफ घूमता रहा
➡️ हंसते हुए सरेंडर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
➡️ नर्सिंग छात्रा के साथ मारपीट व बदसलूकी का आरोप
हसीन दानिश/ जनमाध्यम
बरेली। शनिवार को कचहरी पर जो नजारा दिखा, उसने कानून की गंभीरता और व्यवस्था की साख दोनों पर तीखे सवाल खड़े कर दिए। 27 दिसंबर को डेन कैफे में नर्सिंग छात्रा की बर्थडे पार्टी में घुसकर मारपीट, बदसलूकी और तोड़फोड़ करने वाला मुख्य आरोपी ऋषभ ठाकुर, जिसे खुद को सनातनी रक्षक बताने में कोई झिझक नहीं वही आरोपी बेखौफ, बेपरवाह और हंसते हुए कोर्ट पहुंचा और कोर्ट नंबर 05 में सरेंडर कर दिया। न चेहरा ढका, न कदमों में हिचक मानो किसी गंभीर आपराधिक मामले का आरोपी नहीं, बल्कि कोई चर्चित चेहरा हो जो कैमरों के बीच से गुजर रहा हो।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में आरोपी की चाल ढाल, ठहाके और साथियों की मौजूदगी देखकर यही एहसास होता है कि कानून का डर कहीं दूर छूट गया है। पुलिस जिन दबिशों और तलाश का दावा कर रही थी, उनके बीच आरोपी खुलेआम बैठकों में दिखता रहा, वीडियो जारी करता रहा और चुनौतियां देता रहा। और अंत में खुद ही कोर्ट पहुंचकर जैसे कह दिया हो, लो जी, आ गया! यह दृश्य जितना चौंकाने वाला है, उतना ही व्यवस्था पर व्यंग्य भी। इस पूरे प्रकरण की विडंबना पीड़िता के दर्द से और गहरी हो जाती है। नर्सिंग छात्रा ने अपनी शिकायत में बताया था कि कैसे पार्टी में घुसकर उसके दोस्तों को पीटा गया, महिलाओं से बदसलूकी हुई, मोबाइल छीनने की कोशिश की गई और भय का माहौल बनाया गया। उस रात का डर, अपमान और असुरक्षा इन सबके सामने आरोपी का यह हंसता हुआ सरेंडर किसी जख्म पर नमक छिड़कने जैसा है। राष्ट्रीय सेवा संघ के महामंत्री सोनू ठाकुर ने सरेंडर की पुष्टि करते हुए बताया कि आरोपी को जेल भेज दिया गया है। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते। अगर आरोपी इतनी बेफिक्री से, हंसते खेलते सरेंडर कर सकता है, तो फिर पुलिस की तलाश किसके लिए थी? क्या यह सब महज़ औपचारिकता थी, या फिर रसूख का वह खेल, जिसमें कानून की धार कुंद पड़ जाती है? शहर में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि सरेंडर का यह स्टाइल कहीं सोमवार की जमानत की तैयारी तो नहीं? सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं,क्या यही न्याय की प्रक्रिया है, या नाटक का अगला अंक? जब आरोपी अदालत में मुस्कुराता हुआ दाखिल हो और पीड़िता की आंखों में अब भी डर ठहरा हो, तब व्यवस्था को आत्ममंथन करना चाहिए।
कैफे कांड का यह अध्याय फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुका है, लेकिन हंसी की वह तस्वीर और पुलिस की कथित बेबसी अब भी लोगों के जेहन में घूम रही है। सवाल साफ है,क्या कानून सच में बराबरी से चलता है, या फिर कुछ लोग उसे हंसते हुए पार कर जाते हैं? जवाब अब जांच, अदालत और व्यवस्था को देना है बिना मुस्कान के, पूरी गंभीरता के साथ।