वर्दी में ममता की जगह

डीआईजी अजय कुमार साहनी की पहल से बरेली परिक्षेत्र के थानों में शिशु गृह बने। महिला पुलिसकर्मी मातृत्व और ड्यूटी में संतुलन पा रही हैं।

वर्दी में ममता की जगह
HIGHLIGHTS:

➡️ डीआईजी अजय कुमार साहनी की पहल से थानों में शिशु गृह
➡️ महिला पुलिसकर्मी ड्यूटी और मातृत्व में संतुलित
➡️ बच्चों के खेलने, आराम और देखभाल की पूरी व्यवस्था
➡️ स्तनपान कक्ष सहित सुरक्षित वातावरण
➡️ बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर में 45 शिशु गृह स्थापित
➡️ महिला सशक्तीकरण और आत्मसम्मान को बढ़ावा
➡️ पुलिस कार्यकुशलता और मनोबल में सुधार
➡️ संवेदनशील नेतृत्व का प्रतीक, वर्दी में ममता

जन माध्यम। बरेली।

पुलिस की वर्दी अक्सर सख्ती,अनुशासन और कानून के प्रतीक के रूप में देखी जाती है, लेकिन जब उसी वर्दी के भीतर छुपी ममता और जिम्मेदारियों को समझा जाए, तो व्यवस्था और मजबूत बनती है। डीआईजी अजय कुमार साहनी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने महिला पुलिसकर्मियों की उन अनकही परेशानियों को महसूस किया, जो ड्यूटी और मातृत्व के बीच हर दिन जूझती हैं,और उसी संवेदना से जन्मी है,थानों और पुलिस कार्यालयों में शिशु गृह क्रेच की अभिनव पहल। उत्तर प्रदेश पुलिस में महिला कर्मियों की बढ़ती संख्या ने सुरक्षा व्यवस्था को नई ताकत दी है, लेकिन इसके साथ उनकी जिम्मेदारियां भी दोगुनी हो गई हैं। एक ओर कानून व्यवस्था संभालने की चुनौती, तो दूसरी ओर घर और बच्चों की चिंता। डीआईजी अजय कुमार साहनी ने इस सच्चाई को केवल समझा ही नहीं, बल्कि उसे जमीन पर उतारने का साहसिक निर्णय लिया। पुलिस महानिदेशक के निर्देशों के क्रम में उन्होंने परिक्षेत्र के सभी जनपदों में महिला अनुकूल कार्यस्थल बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए। थानों में बने ये शिशु गृह केवल कमरे नहीं हैं, बल्कि भरोसे और राहत के केंद्र हैं। यहां महिला पुलिसकर्मी निश्चिंत होकर अपनी ड्यूटी निभा सकती हैं, क्योंकि उनके बच्चे सुरक्षित माहौल में देखरेख पा रहे हैं। बच्चों के खेलने, आराम करने और देखभाल की पूरी व्यवस्था के साथ माताओं के लिए स्तनपान कक्ष भी बनाए गए हैं। यह व्यवस्था यह संदेश देती है कि पुलिस विभाग अब केवल आदेश नहीं देता, बल्कि अपने कर्मियों की भावनाओं को भी समझता है।
बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर जनपदों में अब तक 45 शिशु गृह स्थापित हो चुके हैं। बरेली जिले के थानों से लेकर शाहजहांपुर के प्रत्येक थाने तक यह पहल पहुंच चुकी है। यह बदलाव सिर्फ इमारतों का नहीं, बल्कि सोच का है एक ऐसी सोच, जिसमें महिला सशक्तीकरण नारे नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। डीआईजी अजय कुमार साहनी की यह पहल साबित करती है कि जब नेतृत्व संवेदनशील हो, तो सख्त मानी जाने वाली वर्दी भी मानवीय बन जाती है। यह सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि महिला पुलिसकर्मियों के आत्मसम्मान, मनोबल और कार्यकुशलता को नई ऊंचाई देने वाला कदम है एक ऐसा कदम, जो पुलिस व्यवस्था को भीतर से मजबूत करता है।