निर्माण में बड़ा खेल, 18 करोड़ की सरकारी बिल्डिंग अवैध घोषित

बरेली नगर निगम द्वारा बनाई गई एक बहुमंजिला इमारत अब अवैध घोषित कर दी गई है, क्योंकि इसका नक्शा बरेली विकास प्राधिकरण (BDA) से पास नहीं कराया गया और न ही फायर एनओसी ली गई। यह परियोजना 2018 में शुरू हुई थी और ₹18 करोड़ की लागत आई, लेकिन इमारत अभी भी अधूरी है। इसके बावजूद, 2022 में इसका उद्घाटन कर दिया गया और सरकारी दफ्तरों को यहां स्थानांतरित कर दिया गया। ठेकेदार वीके कंस्ट्रक्शंस ने कहा कि नक्शा पास कराने और एनओसी लेने की जिम्मेदारी नगर निगम की थी। निर्माण की गुणवत्ता खराब है और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई है। अब नगर निगम और लोक निर्माण विभाग (PWD) की भूमिका की जांच की जा रही है, और उच्चस्तरीय जांच की मांग की जा रही है।

निर्माण में बड़ा खेल, 18 करोड़ की सरकारी बिल्डिंग अवैध घोषित
  • बिना नक्शा पास और फायर एनओसी कैसे खड़ी हो गई इमारत?

  • जिम्मेदार कौन? ठेकेदार ने पल्ला झाड़ा

  • पीडब्ल्यूडी की संदिग्ध भूमिका, कैसे मिली क्लीन चिट?

बरेली। नगर निगम द्वारा बनाई गई बहुमंजिला इमारत अब अवैध घोषित कर दी गई है। इसका प्रमुख कारण- इसका नक्शा। जिसको बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) से पास नहीं कराया गया और न ही फायर ब्रिगेड से अनिवार्य एनओसी ली गई। इस पर अब तक 18 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जबकि परिसर के सौंदर्यीकरण के लिए बरेली स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत 4 करोड़ रुपये अलग से खर्च किए गए हैं। खुलासा सामने आते ही नगर निगम और प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घोटाले का खुलासा निर्माण कार्य की जिम्मेदारी संभाल रही एजेंसी वीके कंस्ट्रक्शंस के प्रोजेक्ट मैनेजर अमित टम्टा ने किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी एजेंसी केवल निर्माण कार्य के लिए अनुबंधित थी। जबकि, इमारत का नक्शा पास कराना और आवश्यक एनओसी लेना पूरी तरह नगर निगम अधिकारियों की जिम्मेदारी थी। मामले से स्पष्ट होता है कि नगर निगम की लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी के कारण यह गैर-कानूनी निर्माण कार्य हुआ।

गाजियाबाद की वीके कंस्ट्रक्शंस को 2018 में 1754 वर्ग मीटर भूमि पर इस बहुमंजिला इमारत के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी। इस परियोजना को 6 अप्रैल 2023 तक पूरा किया जाना था, लेकिन विभिन्न कारणों से अब तक यह अधूरी पड़ी हुई है। खास बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले ही, 7 जनवरी 2022 को अधूरी इमारत का उद्घाटन कर दिया गया। इसके बाद मेयर और नगर आयुक्त के दफ्तर सहित अन्य सरकारी कार्यालयों को इसमें स्थानांतरित भी कर दिया गया। जिससे प्रशासन की लापरवाही और जल्दबाजी उजागर होती है।इस इमारत का प्रारंभिक बजट 12.5 करोड़ रुपये तय किया गया था, लेकिन यह बढ़कर 18 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके बावजूद निर्माण की गुणवत्ता इतनी खराब रही कि कई जगहों पर प्लास्टर उखड़ने लगा है। स्थिति को देखते हुए कमिश्नर के निर्देश पर नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य ने एक जांच कमेटी गठित की है। कमेटी न केवल निर्माण गुणवत्ता की जांच करेगी, बल्कि यह भी देखेगी कि बिना पूरा हुए इस इमारत का उद्घाटन कैसे कर दिया गया और सरकारी कार्यालयों को इसमें कैसे स्थानांतरित किया गया।
बीडीए से नक्शा पास कराए बिना ही पांच मंजिला इमारत खड़ी कर दी गईं। यह पूरा मामला नगर निगम और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत को दर्शाता है। नगर निगम के अधिकारियों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए निर्माण कार्य को मंजूरी दे दी, जबकि टेंडर प्रक्रिया में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के संकेत मिल रहे हैं।

फायर एनओसी के बिना इस इमारत को उपयोग में लाना कर्मचारियों, अधिकारियों और आम नागरिकों की जान जोखिम में डालने जैसा है। किसी भी संभावित दुर्घटना की स्थिति में बड़ा नुकसान हो सकता है। प्रशासन की ओर से इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जो घोर लापरवाही को दर्शाता है। नगर निगम की इस बहुमंजिला इमारत की दूसरी बार लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा जांच की जा रही है। पिछली जांच की तरह इस बार भी एजेंसी को क्लीन चिट देने की योजना बनाई जा रही है। नगर निगम के निर्माण विभाग, पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों और कार्यदायी एजेंसी के बीच मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। मामूली खामियों को उजागर कर निर्माण कार्य को संतोषजनक घोषित करने की रणनीति तैयार की जा रही है, ताकि इस घोटाले पर पर्दा डाला जा सके।

इस पूरे मामले के उजागर होने के बाद शहर के जागरूक नागरिकों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बिना नक्शा पास कराए और सुरक्षा मानकों का पालन किए बिना बनी इस इमारत को तुरंत सील किया जाना चाहिए और दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। साथ ही घोटाले में शामिल सभी लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए।