शहर विधानसभा सीट पर समाजसेविका का नाम आने से कांग्रेसी नेताओं में खलबली
बरेली शहर विधानसभा सीट पर कांग्रेस टिकट के संभावित दावेदारों के बीच राफिया शबनम का नाम चर्चा में आने से राजनीतिक हलचल तेज होने की बात सामने आई है। हालांकि पार्टी ने अभी किसी प्रत्याशी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
शहर विधानसभा सीट से राफिया शबनम का नाम कांग्रेस टिकट की चर्चा में बताया जा रहा है।
टिकट के अन्य दावेदारों के लखनऊ पहुंचकर प्रदेश नेतृत्व से संपर्क साधने की चर्चा है।
कांग्रेस ने अभी तक शहर सीट के लिए किसी प्रत्याशी के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
जन माध्यम
बरेली। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर शहर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के टिकट की चर्चा शुरू होते ही स्थानीय राजनीति में हलचल मच गई है। सब का हक़ ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्षा और शहर की जानी-मानी समाजसेविका राफिया शबनम का नाम जब इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चर्चा में आया, तो कई कांग्रेसी नेताओं में बेचैनी फैल गई। इनमें से कई नेता लखनऊ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय का रूख करने लगे हैं।
सूत्रों के अनुसार, शहर विधानसभा क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय राफिया शबनम का नाम इसलिए चर्चा में है क्योंकि वे पिछले कई वर्षों से सामाजिक कार्यों में जुड़ी रही हैं। सब का हक़ ऑर्गेनाइजेशन के माध्यम से उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर आवाज उठाई है। उनके इस सक्रिय योगदान और क्षेत्र में मौजूद पहचान को देखते हुए कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच यह राय बन रही है कि अगर पार्टी नया और सक्रिय चेहरा मैदान में उतारती है तो शहर सीट पर बेहतर प्रदर्शन संभव हो सकता है।
यह चर्चा शुरू होते ही उन कांग्रेसी नेताओं में खलबली मच गई, जो पारंपरिक रूप से टिकट की दौड़ में खुद को आगे मानते रहे हैं। कई नेता लखनऊ पहुंचकर प्रदेश नेतृत्व से मुलाकात करने और अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश में जुट गए हैं। स्थानीय स्तर पर यह देखा जा रहा है कि कुछ नेता चुनावी मौसम शुरू होते ही सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही जनता की नजरों से गायब हो जाते हैं।
आम मतदाताओं और पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं के बीच यह शिकायत लंबे समय से रही है कि कई नेता केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सक्रिय दिखते हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान वे मतदाताओं के बीच पहुंचते हैं, वादे करते हैं और समर्थन मांगते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे बिल में घुस जाते हैं। मतदाताओं की रोजमर्रा की समस्याएं—सड़क, पानी, बिजली, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य या स्थानीय विकास से जुड़े मुद्दे—उनके एजेंडे से गायब हो जाते हैं। इस वर्ग के नेताओं को समाजसेविका का नाम चर्चा में आने पर सबसे ज्यादा असुविधा हो रही है।
शहर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के डॉ. अरुण कुमार सक्सेना ने यहां से जीत दर्ज की थी। कांग्रेस इस सीट पर लंबे समय से कमजोर प्रदर्शन कर रही है। ऐसे में अगर पार्टी कोई नया और जमीनी स्तर पर सक्रिय चेहरा उतारती है तो पारंपरिक समीकरण बदल सकते हैं। राफिया शबनम का नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे पहले भी चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं और क्षेत्र में उनकी सामाजिक पहचान बनी हुई है।
कांग्रेस के अंदर इस चर्चा को लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है। एक वर्ग का मानना है कि पार्टी को नए चेहरों को मौका देना चाहिए, खासकर उन लोगों को जो लगातार सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे हैं। दूसरा वर्ग पुराने नेताओं का है, जो अनुभव और संगठन के आधार पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं। लखनऊ में पहुंच रहे नेताओं की कोशिश यही है कि प्रदेश नेतृत्व को यह संदेश दिया जाए कि टिकट का फैसला पुराने समीकरणों के आधार पर ही हो।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि अगर कांग्रेस वाकई मतदाताओं की समस्याओं को गंभीरता से लेना चाहती है तो उसे उन नेताओं से दूरी बनानी होगी जो केवल चुनावी मौसम में दिखते हैं। मतदाता अब पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं। वे देखते हैं कि कौन साल भर क्षेत्र में सक्रिय रहता है और कौन केवल चुनाव के समय नजर आता है। समाजसेविका का नाम चर्चा में आने के बाद यह सवाल और तेज हो गया है।
अभी तक कांग्रेस की ओर से आधिकारिक रूप से किसी नाम की घोषणा नहीं हुई है। टिकट वितरण की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है और अंतिम फैसला प्रदेश तथा केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर लिया जाएगा। लेकिन शहर विधानसभा सीट पर राफिया शबनम के नाम की चर्चा ने पार्टी के अंदर एक तरह की हलचल जरूर पैदा कर दी है। कई नेता लखनऊ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस अगर शहर सीट पर कोई ठोस प्रदर्शन करना चाहती है तो उसे केवल पुराने समीकरणों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी स्तर पर सक्रिय और विश्वसनीय चेहरे को आगे बढ़ाने पर विचार करना होगा। मतदाता अब वादों से ज्यादा काम और उपस्थिति को महत्व देते हैं। समाजसेविका का नाम चर्चा में आने के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है कि पार्टी उन नेताओं को कितना महत्व देगी जो साल भर गायब रहते हैं और केवल चुनाव के समय सक्रिय हो जाते हैं।
बरेली की राजनीतिक हवा अभी से गर्म होने लगी है। शहर विधानसभा सीट पर टिकट की जंग शुरू हो चुकी है और इसमें समाजसेविका के नाम ने कई पुराने नेताओं को असहज कर दिया है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस चर्चा को कितनी गंभीरता से लेता है और अंतिम फैसला किस दिशा में जाता है।