कृषि विभाग में प्रभार का खेल?
पुराने दरकिनार, नए गोदाम प्रभारी तैनात; मूंगफली बीज की कथित गड़बड़ी के बीच सितंबर के तबादले पर उठे सवाल
डीएम साहब! तय समय बीतने के बाद तबादले का क्या मतलब?
किसानों के बीज पर सवाल, कृषि विभाग की कार्यशैली कठघरे में
पुराने हटे, नए बैठे; प्रभार बदलने की पटकथा पर सवाल
जन माध्यम
बरेली। किसानों के हित और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता के दावे करने वाला कृषि विभाग इन दिनों अपनी ही कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। राजकीय कृषि बीज भंडारों के प्रभारियों को सितंबर में इधर से उधर किए जाने की कार्रवाई ने विभागीय व्यवस्था पर तल्ख सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब शासन की तबादला नीति के तहत स्थानांतरण की समय सीमा पहले से निर्धारित थी, तो सितंबर में प्रभार बदलने की ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी?
आरोप है कि जिले के करीब 10 राजकीय कृषि बीज भंडारों के प्रभारियों को हटाकर नए लोगों को जिम्मेदारी दी गई। इससे पहले मूंगफली बीज वितरण को लेकर कथित अनियमितताओं पर काफी हंगामा हो चुका है और किसान संगठन लगातार जांच की मांग उठा रहे हैं। ऐसे में प्रभार परिवर्तन ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कथित वसूली पूरी करने वाले लोगों को संरक्षण मिला, जबकि रकम देने में आनाकानी करने वालों को रास्ते से हटा दिया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि शिकायतों में रत्तीभर भी सच्चाई है तो यह किसानों के साथ अन्याय और विभागीय व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति होगी।
तिलहन योजना के तहत जिले की पांच तहसीलों के किसानों के लिए करीब 705 क्विंटल मूंगफली बीज आया था, जिसकी कीमत लगभग 75 लाख रुपये बताई गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति के वितरण और फसल प्रदर्शन की निगरानी कितनी ईमानदारी से हुई?
मूंगफली की खेती जिले में मुख्य रूप से आंवला और फरीदपुर क्षेत्र के कुछ हिस्सों में होती है। आरोप है कि इन्हीं क्षेत्रों की फसल की तस्वीरों को अलग अलग कोणों से लेकर पूरे जिले की फसल प्रदर्शन संबंधी पत्रावली तैयार करने की कोशिश की जा रही है। संयुक्त कृषि निदेशक द्वारा खेतों के स्थलीय निरीक्षण और जीपीएस फोटो की जरूरत जताए जाने के बाद कथित रूप से विभाग में अफरा तफरी मची।
सूत्रों का दावा है कि आनन फानन में तस्वीरें जुटाने का प्रयास हुआ। यदि यह सच है तो सवाल केवल तस्वीरों का नहीं, सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और किसानों के हक का है।
इसी बीच बहेड़ी क्षेत्र में कथित तौर पर आंदोलन की चेतावनी देने वाले एक किसान नेता को 35 हजार रुपये दिए जाने का आरोप भी सामने आया है। वहीं हटाए गए गोदाम प्रभारी का दावा है कि उनके क्षेत्र का काम उनके द्वारा कराया गया और भुगतान अभी बाकी है। आरोप है कि भुगतान नए प्रभारी के माध्यम से कराने की तैयारी है।
अब डीएम अविनाश सिंह के निर्देश पर चल रही खसरा पड़ताल इस पूरे मामले की असल तस्वीर सामने ला सकती है। कहां कितनी मूंगफली बोई गई, किस खेत में फसल है और सरकारी रिकॉर्ड में क्या दर्ज है स्थलीय सत्यापन सब कुछ साफ कर सकता है।
कृषि विभाग को चाहिए कि आरोपों को दबाने के बजाय खुली जांच कराए। क्योंकि किसान की मेहनत, सरकारी बीज और सरकारी धन पर किसी भी तरह की कथित बंदरबांट बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अगर विभाग पाक साफ है तो जांच से डर कैसा? और अगर कहीं खेल हुआ है तो फिर पर्दा क्यों?