नवरात्रि के पहले दिन मंदिरों में दिखा आस्था का नज़ारा
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन शीशगढ़, बरेली में मां शैलपुत्री की पूजा के लिए मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। व्रत रखकर मांगी सुख-शांति की कामना।
नवरात्रि के पहले दिन मंदिरों में उमड़ी भारी भीड़
महिलाओं और किशोरियों ने मां शैलपुत्री की पूजा की
सफेद वस्त्र और मिठाइयों का विशेष भोग चढ़ाया गया
देश में सुख-शांति और स्वास्थ्य के लिए की गई प्रार्थना
जन माध्यम
शीशगढ़ (बरेली)। “सुबह की पहली किरण के साथ जब मंदिरों में घंटियां बजीं… तो हर चेहरे पर एक ही विश्वास था "मां आई हैं, अब सब ठीक होगा।”
मंदिरों में सुबह से ही उमड़ी भीड़
चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन कस्बे के मंदिरों में आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। शीशगढ़, गिरधरपुर और बिल्सा सहित आसपास के गांवों के मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं और किशोरियां विशेष रूप से मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना में लीन नजर आईं। पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हो गया।
सफेद वस्त्र और भोग का विशेष महत्व
भक्तों ने माता को सफेद वस्तुएं अर्पित कीं, खासकर घी और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाया गया। कई श्रद्धालुओं ने सफेद रंग के वस्त्र धारण किए, जिसे शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान माता के मंत्रों का 108 बार जाप किया गया और सुख-शांति, स्वास्थ्य व देश में अमन-चैन की कामना के साथ व्रत रखा गया। यह आस्था का वो रूप है, जो हर साल लोगों को एक सूत्र में बांध देता है।
मां शैलपुत्री का महत्व और स्वरूप
मां शैलपुत्री को देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। यह शक्ति, स्थिरता और साहस का प्रतीक हैं। देवी वृषभ (नंदी) पर सवार रहती हैं, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। धार्मिक मान्यता है कि इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है।
पौराणिक कथा से जुड़ी आस्था
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। उन्होंने भगवान शिव का अपमान सहन न कर आत्मदाह कर लिया था। अगले जन्म में हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेकर उन्होंने पुनः शिव से विवाह किया। यही कारण है कि नवरात्रि का पहला दिन शक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।