मुहर्रम का कदीमी जुलूस बना एकता की मिसाल

सैंथल में मुहर्रम की 5वीं तारीख को निकला कदीमी जुलूस-ए-अलम हिन्दू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बनकर सामने आया।

मुहर्रम का कदीमी जुलूस बना एकता की मिसाल
HIGHLIGHTS:

सैंथल में मुहर्रम की 5वीं तारीख को कदीमी जुलूस-ए-अलम निकाला गया।

जनाब गेंदन लाल मौर्य के आवास पर अलम-ए-मुबारक का इस्तकबाल किया गया।

आयोजन ने हिन्दू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया।

जन माध्यम
सैंथल/बरेली।
मुहर्रम की 5वीं तारीख पर कस्बा सैंथल में निकाला जाने वाला कदीमी जुलूस-ए-अलम एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम एकता, आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की मिसाल बनकर सामने आया। जुलूस में बड़ी संख्या में मोमिनीन, अज़ादारों और स्थानीय लोगों ने शिरकत कर हज़रत इमाम हुसैन की याद में अकीदत पेश की।

कस्बे के मोहल्ला चौधरी मौर्य बस्ती में हर वर्ष की तरह इस बार भी जनाब गेंदन लाल मौर्य के आवास पर अलम-ए-मुबारक का इस्तकबाल किया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्षों पहले एक मन्नत पूरी होने पर उन्होंने मौला हुसैन की याद में अलम-ए-मुबारक को अपने घर बुलाने और नियाज़ का एहतिमाम करने की परंपरा शुरू की थी, जो आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

जुलूस के दौरान अज़ादारों और श्रद्धालुओं की खिदमत की गई तथा नियाज़ और तबर्रुक का वितरण किया गया। आयोजन में शामिल लोगों ने मुहर्रम के संदेश, इंसानियत, कुर्बानी और भाईचारे को याद किया।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता और पारस्परिक सम्मान की मजबूत परंपरा का प्रतीक भी है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा क्षेत्र में सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूती प्रदान कर रही है।

मुहर्रम के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों के लोगों की सहभागिता ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सामाजिक सद्भाव और आपसी सम्मान ही समाज की सबसे बड़ी ताकत है।