उम्मीदों का सौदा या व्यवस्था की चूक?
महिला अस्पताल से जुड़े आरोपों ने बढ़ाई विभाग की मुश्किलें पीड़ित परिवारो को इंसाफ का इंतजार
कुर्सी छोटी थी, मगर असर इतना बड़ा कि शिकायतें भी बौनी पड़ गईं
फाइलों के सफर से ज्यादा लंबा हो गया फरियादियों का इंतजार
अस्पताल में इलाज कम, प्रभाव और इख्तियार की चर्चा ज्यादा
जन माध्यम
बरेली। सरकारी दफ्तरों में अक्सर लोग उम्मीद लेकर जाते हैं। कोई नौकरी की आस में, कोई अपने हक की तलाश में और कोई अपने परिवार की खुशहाली के सपने सजाकर। लेकिन जब वही उम्मीदें सवालों के बोझ तले दबने लगें और फरियादें फाइलों की गर्द में खो जाएं, तो सिर्फ कागज नहीं, बल्कि कई घरों की खुशियां भी बिखर जाती हैं। जिला महिला अस्पताल से जुड़ा मौजूदा विवाद कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रहा है।
अस्पताल में तैनात एक आउटसोर्स कर्मचारी को लेकर लंबे समय से चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरोप हैं कि वह अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों से कहीं आगे बढ़कर प्रशासनिक कामकाज में अहम भूमिका निभा रहा है। अस्पताल के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर एक कर्मचारी का असर इतना कैसे बढ़ गया कि शिकायतों की आवाज भी उसके सामने बेअसर नजर आने लगी।
मामला केवल प्रशासनिक दखल तक सीमित नहीं है। शिकायत पत्रों में नौकरी दिलाने के नाम पर कथित वसूली, प्रभाव के इस्तेमाल और भर्ती प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। इन शिकायतों की गूंज उच्च अधिकारियों तक पहुंची, लेकिन वक्त गुजरता गया और कार्रवाई की तस्वीर साफ नहीं हो सकी। सबसे ज्यादा तकलीफ उन परिवारों की कहानी सुनकर होती है, जो रोजगार की उम्मीद में अपने अरमानों की गठरी लेकर निकले थे। किसी ने उधार लिया, किसी ने अपनी जमा पूंजी दांव पर लगा दी, तो किसी ने बेहतर भविष्य के ख्वाब देखे। मगर आज वही लोग महीनों से वेतन और रोजगार से जुड़े मामलों को लेकर दफ्तर दफ्तर भटक रहे हैं। उनकी आंखों में सवाल हैं, होंठों पर शिकवे हैं और दिल में यह उम्मीद अब भी बाकी है कि शायद कहीं से इंसाफ की कोई किरण दिखाई दे जाए। विभागीय सूत्र का कहना है कि इससे पहले भी उक्त कर्मचारी का नाम कथित रूप से नौकरी लगवाने के बदले लाखों रुपये लेने के विवाद में सामने आ चुका है। और एक बड़े समाचार पत्र ने इस पूरी घटना को प्रमुखता से छापा उस घटना ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं, मगर समय बीतने के साथ मामला भी धुंधला पड़ता गया। लेकिन जिन लोगों की जिंदगी उस विवाद से प्रभावित हुई, उनके लिए वह कहानी आज भी अधूरी है।
यह पूरा प्रकरण केवल एक व्यक्ति या एक अस्पताल का मामला नहीं है, बल्कि उस भरोसे का सवाल है जो आम आदमी सरकारी व्यवस्था पर करता है। जब शिकायतें लगातार उठती रहें और जवाब न मिले, तो लोगों के दिलों में यह एहसास घर करने लगता है कि शायद उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। आज महिला अस्पताल के इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या व्यवस्था में नियमों से ज्यादा प्रभाव की अहमियत है? क्या फरियादों की फाइलें सिर्फ अलमारियों में बंद रहने के लिए बनती हैं? और क्या उन परिवारों की आहें किसी जिम्मेदार तक पहुंचेंगी, जो महीनों से न्याय की राह देख रहे हैं? जनता अब सिर्फ जांच नहीं, बल्कि सच का खुलासा चाहती है। क्योंकि अगर आरोप गलत हैं तो सच्चाई सामने आनी चाहिए, और यदि आरोपों में सच्चाई है तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। आखिर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत उसकी पारदर्शिता और इंसाफ ही तो होती है। क्योंकि कभी कभी खामोश फाइलें भी बहुत कुछ कह जाती हैं, और दबी हुई फरियादें वक्त आने पर पूरे सिस्टम से सवाल पूछने लगती हैं।