चंपत राय: प्रोफेसर की नौकरी छोड़ राम काज में समर्पित किया जीवन, कहलाए 'अयोध्या की इनसाइक्लोपीडिया'
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के जीवन का संघर्ष। आपातकाल में जेल यात्रा से लेकर राम मंदिर आंदोलन में उनके योगदान की अनसुनी कहानी।
कारसेवकपुरम की एक छोटी सी कोठरी में रहने वाले चंपत राय जी बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं।
1975 में धामपुर के कॉलेज में फिजिक्स के प्रोफेसर थे, संघ से जुड़े होने के कारण 18 महीने जेल में रहे।
सरसंघचालक रज्जू भैया के कहने पर सरकारी नौकरी छोड़ राम मंदिर आंदोलन के लिए खुद को समर्पित किया।
तुशेन्द्र कुमार/जन माध्यम
फतेहगंज पश्चिमी। बरेली। कारसेवकपुरम की एक सामान्य कोठरी में रहने वाले और बेहद सादगीपूर्ण भोजन करने वाले चंपत राय जी का व्यक्तित्व किसी विशाल वटवृक्ष की तरह है। आज पूरा देश जिन्हें 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के महासचिव के रूप में जानता है, उनका पूरा जीवन राष्ट्र और सनातन धर्म के लिए त्याग और समर्पण की अनूठी मिसाल है।
वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान चंपत राय जी बिजनौर के धामपुर स्थित आरएसएम डिग्री कॉलेज में फिजिक्स के प्रोफेसर थे। संघ से जुड़े होने के कारण जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची, तो उन्होंने छात्रों के बीच कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए खुद पुलिस से कहा कि वे क्लास खत्म कर स्वयं थाने आ जाएंगे। इसके बाद वे 18 महीने तक उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद रहे। जेल से रिहा होने के बाद उनके आत्मबल को देखकर तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैया ने उन्हें अयोध्या की जिम्मेदारी सौंपी, जिसके लिए चंपत राय जी ने अपनी सरकारी नौकरी का त्याग कर दिया।
राम काज में जुटने के बाद चंपत राय जी अवध के गांव-गांव और हर घर तक पहुंचे। अवध के इतिहास और भूगोल की असाधारण जानकारी होने के कारण साथी उन्हें "अयोध्या की इनसाइक्लोपीडिया" और "रामलला का पटवारी" बुलाने लगे। बाबरी ढांचा विध्वंस से पूर्व ही उन्होंने राम मंदिर के पक्ष में लाखों पन्नों के दस्तावेजी सबूत और प्राचीन ग्रंथ जुटाए। जब देश के दिग्गज वकील अदालत में जन्मभूमि की कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्हें सबसे अचूक और अकाट्य प्रमाण चंपत राय जी ने ही उपलब्ध कराए थे।
6 दिसंबर 1992 की ऐतिहासिक घटना के समय भी वे अग्रिम पंक्ति में खड़े थे और कल्याण सिंह जी के बाद वे इकलौते ऐसे शख्स हैं जिन्होंने अदालत और जनता के सामने हमेशा पूरी निडरता से उस घटना की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। वे एक ऐसे सच्चे तपस्वी और सनातन के योद्धा हैं, जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देता रहेगा।