पीडब्ल्यूडी में घोड़ों पर हिसाब में पर्दा क्यों?
दामोदर दास पार्क में 17.34 लाख के काम का हिसाब मांग रहा आदेश, पीडब्ल्यूडी की फाइल अब भी बेदम
घोड़ा सजा, मगर हिसाब की फाइल पर धूल जम गई,
डीएम का हुक्म आया पीडब्ल्यूडी की कलम थम गई,
मियाद गुजर गई, रिपोर्ट फिर भी फाइलों में कैद,
जन माध्यम
बरेली। सेठ दामोदर दास पार्क के पास खड़ा घोड़ा अपनी जगह पर खामोश है, मगर उसके आसपास हुए सरकारी खर्च की कहानी अब सवालों की टाप सुनाने लगी है। क्रिटिकल गैप्स योजना के तहत 17.34 लाख रुपये की धनराशि जारी हुई। काम हुआ, तस्वीरें सामने आईं, मगर जब सरकारी कामकाज का सबसे जरूरी हिस्सा हिसाब और प्रगति रिपोर्ट मांगने की बारी आई तो पीडब्ल्यूडी की फाइल जैसे रास्ते में ही लगाम टूटने के बाद खड़ी हो गई।
डीएम के स्पष्ट निर्देश थे कि योजना की वित्तीय और भौतिक प्रगति की रिपोर्ट प्रत्येक माह की दो तारीख तक उपलब्ध कराई जाए। आदेश कागज पर बाकायदा दर्ज था। यानी तारीख भी तय, जिम्मेदारी भी तय और रिपोर्ट का प्रारूप भी साफ। बावजूद इसके जून की रिपोर्ट तय समय पर नहीं पहुंची।
21 जुलाई 2026 को अर्थ एवं संख्याधिकारी कार्यालय से जारी पत्र ने विभागीय सुस्ती पर पर्दा हटाया। पत्र में जून की प्रगति रिपोर्ट अब तक प्राप्त न होने की बात दर्ज की गई। सवाल बेहद सीधा है जब डीएम ने समय सीमा बांध दी थी तो पीडब्ल्यूडी के जिम्मेदारों ने रिपोर्ट भेजने में ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई?
घोड़ा अपनी जगह, हिसाब अपनी जगह क्यों?
पार्क में घोड़ा खड़ा है। लोग उसके पास से गुजरते हैं, उसे देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। मगर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज 17.34 लाख रुपये का सवाल इतनी आसानी से आगे नहीं बढ़ सकता। जनता के पैसे से हुआ काम सिर्फ तस्वीरों और दावों तक सीमित नहीं रह सकता। उसके खर्च का पूरा ब्यौरा भी सामने आना चाहिए।
अगर काम निर्धारित मानकों के मुताबिक हुआ है तो रिपोर्ट भेजने में गुरेज कैसा? यदि काम में कोई कमी या देरी है तो उसे रिपोर्ट में दर्ज करने से परहेज क्यों? और यदि सब कुछ दुरुस्त है तो विभागीय प्रगति रिपोर्ट समय पर डीएम कार्यालय तक क्यों नहीं पहुंची?
यही सवाल अब पीडब्ल्यूडी की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रहे हैं। डीएम का आदेश भी फाइलों की धूल में दबा?
सरकारी व्यवस्था आदेशों से चलती है, मनमर्जी से नहीं। डीएम ने जब हर माह रिपोर्ट मांगी तो उसका मकसद महज कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि सरकारी धन और काम की निगरानी था। लेकिन एक माह बीतने के बाद भी रिपोर्ट का इंतजार यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर विभाग में जवाबदेही की लगाम किसके हाथ में है?
घोड़ा पार्क में अपनी जगह खड़ा है, मगर 17.34 लाख के काम की रिपोर्ट रास्ते में क्यों अटकी है इसका जवाब अब पीडब्ल्यूडी को देना होगा।
जनता को घोड़े की चमकती शक्ल से ज्यादा उस रकम का साफ सुथरा हिसाब चाहिए, जो उसकी जेब से निकलकर सरकारी काम में लगी है। विकास की असली पहचान पत्थर, प्रतिमा या सजावट नहीं, बल्कि पाई पाई का पारदर्शी हिसाब और समय पर जवाबदेही है।
अब देखना यह है कि डीएम के आदेश की अनदेखी पर जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाता है या फिर यह फाइल भी सरकारी दफ्तरों की उस लंबी कतार में शामिल हो जाती है, जहां काम से ज्यादा इंतजार और जवाब से ज्यादा खामोशी दिखाई देती है।