पशुधन मंत्री के जिले में11 गोवंश की मौत
कान्हा उपवन में एक सप्ताह में 11 गोवंश ने तोड़ा दम, चारा-पानी और इलाज पर उठे गंभीर सवाल
दो मंत्री, सात विधायक, सांसद और मेयर फिर भी बेजुबानों की फरियाद अनसुनी!
पशुधन मंत्री के गृह जिले में गौशाला की बदहाली ने खोली व्यवस्था की पोल
आस्था के नाम पर दावे बहुत, कान्हा उपवन में 11 मौतों ने पूछे तीखे सवाल
जन माध्यम
बरेली। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोवंश संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि आस्था, संवेदना और जिम्मेदारी से जोड़ा है। गौशालाओं में गोवंश को सुरक्षित आश्रय, चारा, पानी और उपचार मिले इसके लिए शासन स्तर से लगातार निर्देश दिए जाते रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री की इस नेक मंशा के ठीक उलट जिले के कान्हा उपवन से सामने आई तस्वीर व्यवस्था की संवेदनशीलता पर ही सवाल खड़े कर रही है।
करीब एक सप्ताह में 11 गोवंश की मौत। यह आंकड़ा महज संख्या नहीं, बल्कि उन बेजुबान जिंदगियों की कहानी है, जो बोल नहीं सकती थीं, अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकती थीं और शायद अपने हिस्से के चारे पानी और इलाज के लिए किसी इंसान की निगाह का इंतजार करती रहीं।
आरोप है कि कान्हा उपवन में गोवंश को पर्याप्त चारा पानी नहीं मिला और बीमार पशुओं के उपचार में भी लापरवाही बरती गई। मौत की असली वजह जांच पूरी होने के बाद सामने आएगी, लेकिन एक सप्ताह के भीतर 11 गोवंश की मौत ने नगर निगम से लेकर जिम्मेदार अफसरों तक की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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सबसे बड़ा सवाल पशुधन मंत्री के अपने जिले में यह हाल क्यों?
इस पूरे मामले का सबसे कड़वा पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश के पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह स्वयं बरेली जिले के आंवला क्षेत्र से विधायक हैं। जिस जिले से प्रदेश सरकार में पशुधन विभाग का नेतृत्व करने वाला मंत्री आता हो, उसी जिले की गौशाला में अगर 11 गोवंश की मौत हो जाए तो सवाल सिर्फ कान्हा उपवन तक सीमित नहीं रहते।
सवाल सीधे व्यवस्था के माथे पर दस्तक देते हैं।
क्या शासन के निर्देश नीचे तक नहीं पहुंच रहे? क्या गौशालाओं की निगरानी केवल कागजों में चल रही है? क्या निरीक्षण की रिपोर्टों में सब कुछ दुरुस्त दिखाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है? और सबसे अहम अगर बेजुबानों की हालत इतनी खराब थी तो जिम्मेदार तंत्र को समय रहते इसकी खबर क्यों नहीं हुई?
यह विडंबना ही है कि गोवंश संरक्षण की सियासत में बड़े बड़े दावे होते हैं, लेकिन जब उन्हीं गोवंश की जिंदगी का सवाल जमीन पर आता है तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
दो मंत्री, सात विधायक, सांसद फिर भी निगरानी में इतनी बड़ी चूक?
जिले में भाजपा के पास जनप्रतिनिधियों की लंबी कतार है। वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार, पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह, कैंट विधायक संजीव अग्रवाल, मीरगंज विधायक डॉ. डीसी वर्मा, बिथरी चैनपुर विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा, नवाबगंज विधायक डॉ. एमपी आर्य समेत जिले के अन्य भाजपा विधायक, सांसद छत्रपाल सिंह और मेयर डॉ. उमेश गौतम जैसे जनप्रतिनिधि मौजूद हैं।
इसके बावजूद कान्हा उपवन में 11 गोवंश की मौत का मामला सामने आना राजनीतिक रसूख से ज्यादा प्रशासनिक निगरानी की कमजोरी का आईना बन गया है।
जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल सड़क, नाली और बिजली की शिकायत सुनने तक नहीं हो सकती। जिन जीवों के नाम पर आस्था जुड़ी है, उनकी जिंदगी और उनकी दुर्दशा भी जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में होनी चाहिए।
नोटिस और एफआईआर से आगे बढ़ेगा मामला?
नगर निगम ने पशु कल्याण अधिकारी डॉ. हरपाल सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा है। जवाब संतोषजनक न मिलने पर विभागीय कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। वहीं गौरक्षकों के आक्रोश के बाद सीबीगंज थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई है।
एफआईआर में रचित अग्रवाल आरके एंटरप्राइजेज, विशाल मल्होत्रा, गौशाला सुपरवाइजर विजय उर्फ बनवारी तथा अज्ञात केयरटेकर और संचालक को नामजद किया गया है। इन पर पशु क्रूरता और लापरवाही से जुड़े आरोप लगाए गए हैं। एफआईआर में नामजदगी आरोप है, दोष सिद्ध होना नहीं, इसलिए जांच में सामने आने वाले तथ्यों पर ही अंतिम जिम्मेदारी तय होगी।
लेकिन शहर अब सिर्फ नोटिस और मुकदमे से संतुष्ट नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि जांच में यह पता लगाया जाए कि चारा पानी, उपचार, सफाई और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी और अगर कहीं लापरवाही हुई तो उसकी पूरी कड़ी कहां तक जाती है।
आस्था की परीक्षा कागजों में नहीं, गौशाला के फर्श पर होती है।
सुंदरासी में 500 से अधिक गोवंश की क्षमता वाली नई गौशाला का निर्माण तेज किया जा रहा है। नगर आयुक्त ने अधिकारियों को नियमित निरीक्षण और रिपोर्ट देने के निर्देश भी दिए हैं। यह कदम जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि जब तक पुरानी व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं होगी, नई इमारतें कितनी समस्या हल कर पाएंगी?
गोवंश किसी राजनीतिक नारे का हिस्सा नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। उसकी आंखों में उतर आई बेबसी किसी भाषण से बड़ी चीख होती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की मंशा अगर गोवंश को संरक्षण और सम्मान देने की है, तो जिले की इस घटना को एक चेतावनी की तरह लिया जाना चाहिए। जांच निष्पक्ष हो, दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई हो और ऐसी व्यवस्था बने कि किसी गौशाला में फिर कोई बेजुबान भूख, प्यास या इलाज के अभाव में दम न तोड़े।
क्योंकि आस्था का असली इम्तिहान मंदिरों की चौखट पर नहीं, उन बेजुबानों की आंखों में होता है जो इंसान से सिर्फ इतनी उम्मीद रखते हैं कि वह उन्हें जीने दे।