सात साल से साइकिल भत्ते का इंतजार कर रहे रेलकर्मी
बरेली के रेलवे ट्रैकमैन समेत फील्ड कर्मचारियों का जुलाई 2017 से अगस्त 2024 तक का साइकिल भत्ता एरियर लंबित है। कर्मचारी भुगतान की मांग कर रहे हैं, जबकि रेलवे ने फिर से भुगतान के निर्देश जारी किए हैं।
• जुलाई 2017 से अगस्त 2024 तक का साइकिल भत्ता एरियर अब भी लंबित।
• बरेली के ट्रैकमैन समेत फील्ड कर्मचारियों ने वर्षों से भुगतान न मिलने पर जताई नाराजगी।
• उत्तर रेलवे के पत्रों में लंबित भुगतान का उल्लेख, दोबारा जारी हुए निर्देश।
जन माध्यम
बरेली। देश में रेलवे जहां हाईस्पीड ट्रेनों और आधुनिक सुविधाओं की ओर तेजी से बढ़ने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर पटरियों की सुरक्षा में दिन-रात जुटे कर्मचारियों का वर्षों पुराना साइकिल भत्ता अब भी भुगतान की प्रतीक्षा में है। बरेली समेत उत्तर रेलवे के मुरादाबाद मंडल के ट्रैकमैन और अन्य फील्ड कर्मचारियों का जुलाई 2017 से अगस्त 2024 तक का साइकिल भत्ता एरियर आज भी लंबित है।
उत्तर रेलवे, मुरादाबाद मंडल के आधिकारिक पत्रों से स्पष्ट हुआ है कि सात वर्षों से अधिक अवधि का साइकिल एलाउंस एरियर अब तक कर्मचारियों को नहीं मिल सका है। कर्मचारी संगठनों द्वारा कई बार मामला उठाए जाने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ। हाल ही में अधिकारियों की ओर से लंबित भुगतान की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए फिर से निर्देश जारी किए गए हैं।
सबसे अधिक प्रभावित ट्रैकमैन और फील्ड स्टाफ हैं, जो भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और बारिश के बीच रेलवे पटरियों की नियमित निगरानी करते हैं। यही कर्मचारी प्रतिदिन हजारों ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन उनका वैधानिक भत्ता वर्षों से सरकारी फाइलों में अटका हुआ है।
कर्मचारियों का कहना है कि आज अधिकांश लोग ड्यूटी के लिए साइकिल नहीं बल्कि मोटरसाइकिल का उपयोग करते हैं। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बावजूद रेलवे न तो भत्ते की व्यवस्था को समय के अनुरूप संशोधित कर रही है और न ही वर्षों से लंबित एरियर का भुगतान कर पा रही है। इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है।
रेलवे के आधिकारिक पत्र स्वयं इस बात की पुष्टि करते हैं कि भुगतान लंबित है। ऐसे में कर्मचारियों का सवाल है कि जब वे रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, तो उन्हें अपने ही स्वीकृत भत्ते के लिए वर्षों तक इंतजार क्यों करना पड़ रहा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि इस बार जारी हुए निर्देश वास्तविक भुगतान में बदलते हैं या फिर यह मामला एक बार फिर सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।