शब-ए-बरात: रहमत और माफी की मुकद्दस रात

सैंथल में शब-ए-बरात की मुकद्दस रात पर इबादत और दुआओं का दौर चला। हाफिज इरशाद उल कादरी नूरी ने इसे रहमत, मगफिरत और कुबूलियत की रात बताया।

शब-ए-बरात: रहमत और माफी की मुकद्दस रात
HIGHLIGHTS:

➡️ शब-ए-बरात को बताया रहमत और माफी की रात
➡️ हर जायज दुआ के कुबूल होने का जिक्र
➡️ पूरी रात इबादत की नसीहत

सरफराज़ खान । जन माध्यम
सैंथल (बरेली)।
मदरसा ए जामिया हंफिया नूरिया के मैनेजिंग डायरेक्टर हाफिज इरशाद उल कादरी नूरी ने कहा कि शब-ए-बरात सिर्फ गुनाहों से तौबा और माफी मांगने की रात नहीं है, बल्कि यह वह मुकद्दस रात है जिसमें बंदा अपने रब से इज्जत, शोहरत, दौलत, सेहत और हर जायज मुराद मांग सकता है, जिसे अल्लाह तआला अता फरमाता है।

मदरसा परिसर में तालिब-ए-इल्म को खिताब करते हुए उन्होंने कहा कि शब-ए-बरात आजादी की रात है। इस रात अल्लाह तआला रूहों को आजाद करता है और उन गुनाहगार बंदों को बख्श देता है, जो सच्चे दिल से उससे माफी के तलबगार होते हैं। उन्होंने बताया कि साल में कई और भी मुकद्दस रातें होती हैं, जिनमें बंदे को अल्लाह से रहमत और माफी मांगनी पड़ती है, लेकिन शब-ए-बरात की खासियत यह है कि इस रात खुद अल्लाह फरमाता है—“है कोई जो मुझसे मांगे और मैं उसे अता कर दूं।”

हाफिज इरशाद उल कादरी नूरी ने कहा कि इस रात न सिर्फ गुनाहों की माफी मिलती है, बल्कि बंदा अपने रब से जो भी जायज ख्वाहिश करता है, अल्लाह उसे कुबूल फरमाता है। उन्होंने तालिब-ए-इल्म को पूरी रात इबादत में मशगूल रहने, अपने लिए और अपने मरहूमीन के लिए मगफिरत की दुआ करने तथा आतिशबाजी जैसी गैर-इस्लामी रस्मों से दूर रहने की नसीहत दी।

इधर, शब-ए-बरात की रात कस्बे और आसपास के गांवों में भी खास रौनक देखने को मिली। लोगों ने घरों में हलवे पर नियाज़ दिलाई और कब्रिस्तानों में जाकर अपने मरहूमीन के ईसाल-ए-सवाब के लिए फातिहा पढ़ी। इस दौरान अल्लाह से अपने बुजुर्गों और अजीजों की मगफिरत और रहमत की दुआएं की गईं।