ड्रग विभाग के दोहरे मापदंड पर सवाल

आगरा नकली दवा रैकेट में शिवा मेडिको नामज़द, बरेली ड्रग विभाग 3 महीने से चुप, छोटे व्यापारियों पर ताबड़तोड़ एक्शन, दोहरा मापदंड बेनकाब।

ड्रग विभाग के दोहरे मापदंड पर सवाल
HIGHLIGHTS:

➡️ आगरा FIR में शिवा मेडिको नामज़द, बरेली में 3 महीने से ज़ीरो एक्शन
➡️ बिल में ₹9 का अंतर, ई-वे बिल गड़बड़ी, फिर भी सिर्फ नोटिस
➡️ छोटे व्यापारियों का लाइसेंस तुरंत सस्पेंड, बड़े नामों पर खामोशी
➡️ अनामिका अंकुर जैन की रिपोर्ट के बावजूद कोई सत्यापन नहीं
➡️ सहायक आयुक्त और इंस्पेक्टर एक-दूसरे पर ठीकरा, जवाबदेही शून्य
➡️ नकली दवा रैकेट पर योगी सरकार की सख्ती, बरेली में सिर्फ दिखावा?

आगरा में एफआईआर, बरेली में कार्रवाई गायब नामजद एजेंसी पर विभाग की रहस्यमयी चुप्पी

जन माध्यम 
बरेली।
शहर के दवा कारोबारियों के बीच एक लाइन इन दिनों दर्द और गुस्से की तरह घूम रही है कुछ पे करम और कुछ पे सितम। बरेली के औषधि विभाग के दोहरे मापदंडों ने यह बात सच साबित कर दी है। आगरा में नकली दवा रैकेट का खुलासा हुआ, एफआईआर दर्ज हुई, नाम सामने आए  लेकिन बरेली में कार्रवाई आज भी फाइलों की धूल में दबी है। वही विभाग, जिसने बगैर नाम दर्ज हुए छोटे कारोबारियों पर बिजली की तरह गिरावट कर दी, वही विभाग तीन महीने से आगरा केस में दर्ज नामों पर चुप है। यह खामोशी खुद एक सवाल बनकर खड़ी है आखिर ये चुनिंदा सख्ती और चुनिंदा नरमी क्यों? नकली दवाओं के रैकेट का मामला सामने आने के बाद आगरा कोतवाली में औषधि निरीक्षक कपिल शर्मा की तहरीर पर बंसल मेडिकल एजेंसी आगरा  और शिवा मेडिको बरेली के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। बरेली की ड्रग इंस्पेक्टर अनामिका अंकुर जैन ने भी शिवा मेडिको के खिलाफ पूरी रिपोर्ट आगरा भेजी थी। लेकिन तीन महीने बीतने पर भी विभाग ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।इसके उलट, वे दवा व्यापारी जिनका एफआईआर में दूर-दूर तक कोई उल्लेख नहीं, जिनकी खरीद-बिक्री पक्के बिलों पर हुई उन पर विभाग ने कड़ी कार्रवाई कर दी। यह अंतर अपने आप में विभाग की नीयत पर सवाल उठाने के लिए काफी है।अनामिका अंकुर जैन द्वारा व्हाट्सऐप पर भेजे गए बिल और ई-वे बिल ने इस पूरे प्रकरण को और उलझा दिया है।बंसल मेडिकल एजेंसी द्वारा बनाया गया बिल  ₹5,70,467
शिवा मेडिको द्वारा प्रस्तुत बिल  ₹5,70,458.01 दोनों में अंतर साफ दिखाई देता है। यही बिल बस्ती मंडल के औषधि अधिकारी को भेजा गया, जहाँ फिर से राशि ₹5,70,467 निकली। बिल में अंतर और ई-वे बिल में गड़बड़ी लेकिन पूछताछ शून्य। कार्रवाई शून्य। सिर्फ नोटिस जारी कर मामला टाल दिया गया। एफआईआर में दर्ज नाम होने के बाद भी विभाग का यह मौन कई तरह के संदेह खड़े कर रहा है।
दवा व्यापारियों का आरोप साफ है आगरा केस में जिन नामों का उल्लेख है, उन पर कार्रवाई ताबड़तोड़ होनी चाहिए थी। लेकिन विभाग सिर्फ नोटिस भेजकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश कर रहा है। जबकि दूसरी तरफ हैप्पी मेडिकोज जैसे व्यापारियों का लाइसेंस बिना पूरी जांच के सस्पेंड कर दिया गया। उनके बिल, चेक और ऑनलाइन पेमेंट के दस्तावेज होने के बावजूद तीन महीने में उनका सत्यापन भी विभाग नहीं कर पाया। सवाल उठते हैं  क्या विभाग चुनी हुई कार्रवाई कर रहा है? क्या छोटे व्यापारियों पर दबाव और बड़े नामों पर संरक्षण की नीति चल रही है?
प्रदेश की योगी सरकार नकली दवाओं पर सबसे सख्त रुख के लिए जानी जाती है। लेकिन बरेली का औषधि विभाग उसके ठीक उलट तस्वीर पेश कर रहा है।तीन माह में न सत्यापन, न सस्पेंशन, न कार्रवाई सिर्फ औपचारिकता। यह ढील न सिर्फ विभाग की साख पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि नकली दवाओं के खतरे को भी बढ़ाती है।
सहायक आयुक्त संदीप कुमार का कहना है रिपोर्ट ड्रग इंस्पेक्टरों के स्तर पर लंबित है, कार्रवाई उनके सत्यापन के बाद ही होगी।
वहीं ड्रग इंस्पेक्टर राजेश कुमार का कहना है,हमने रिपोर्ट भेज दी है, निर्णय सहायक आयुक्त को लेना है।
दोनों अधिकारियों की यह परस्पर विरोधी बातें भी इस पूरे मामले को और संदेहास्पद बना देती हैं।
नकली दवाओं का खतरा किसी एक दुकान या एजेंसी तक सीमित नहीं है। यह सीधे आम लोगों की जान से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में चुनिंदा कार्रवाई और जांच की धीमी रफ्तार बेहद चिंताजनक है।शहर के लोग आज सिर्फ एक जवाब चाहते हैं,आखिर आगरा की एफआईआर में दर्ज नामों पर कार्रवाई क्यों नहीं?जब जवाब नहीं मिलता, तब सवाल सिर्फ सवाल नहीं रहते वे डर बन जाते हैं, अविश्वास बन जाते हैं और कभी-कभी इंसान की जान ले बैठते हैं।