कूड़े के ढेरों में दफ्न हुई शहर की सांसें

हक, रोज़ी और सम्मान की लड़ाई में उतरे संविदाकर्मी, सफाई व्यवस्था हुई बेदम

कूड़े के ढेरों में दफ्न हुई शहर की सांसें
HIGHLIGHTS:

झाड़ू थमी तो खुल गई व्यवस्था की हकीकत, सड़कों पर पसरा कूड़ा।

रोटी,रोज़गार और सम्मान की जंग में उतरे सफाईकर्मी, जनता हुई परेशान।

सफाईकर्मियों के आक्रोश ने रोकी शहर की रफ्तार, बदबू से बेहाल गलियां।

जन माध्यम 
बरेली।
जिस शहर की सुबह कभी साफ सुथरी गलियों और चमकती सड़कों के साथ दस्तक देती थी, वहां इन दिनों गंदगी के ढेर, उठती बदबू और बेबस नागरिकों की आहें दिखाई दे रही हैं। वेतन और सम्मान की लड़ाई ने शहर की रफ्तार को ऐसा थाम दिया है कि सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन से जुड़े संविदाकर्मियों ने अपने छह साथियों पर दर्ज मुकदमों और वेतन विसंगति के विरोध में सामूहिक कार्य बहिष्कार कर दिया है, जिसके चलते शहर का कूड़ा उठान लगभग ठप पड़ गया है।
बुधवार को हालात तब और गंभीर हो गए जब नाराज कर्मचारियों ने विरोध जताने के लिए कुछ स्थानों पर सड़कों पर ही कूड़ा फेंक दिया। देखते ही देखते कई प्रमुख मार्गों, मोहल्लों और बाजारों में गंदगी के अंबार लग गए। राहगीरों को नाक पर रूमाल रखकर गुजरना पड़ा, जबकि स्थानीय लोग बदबू और अव्यवस्था से परेशान नजर आए।
शहर में लगातार दूसरे दिन कूड़ा न उठने से हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं। उमस भरी गर्मी में सड़कों और गलियों में पड़ा कूड़ा अब सिर्फ बदसूरती का नहीं, बल्कि बीमारियों का भी सबब बनने लगा है। लोगों का कहना है कि यदि जल्द व्यवस्था बहाल नहीं हुई तो संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। हर तरफ यही सवाल गूंज रहा है कि आखिर शहर की सफाई व्यवस्था का जिम्मेदार कौन है और आम जनता कब तक इस परेशानी को झेलेगी? प्रदर्शन कर रहे संविदाकर्मियों का दर्द भी कम नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार द्वारा निर्धारित 13 हजार रुपये मासिक वेतन के बजाय उन्हें महज 7,500 रुपये ही दिए जा रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में इतने कम वेतन पर परिवार का पालन पोषण करना किसी इम्तिहान से कम नहीं है। उनका दर्द यह भी है कि वर्षों से बेहतरीन शहर को साफ रखने वाले हाथ आज अपने हक और इंसाफ के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। कर्मचारियों का गुस्सा छह साथियों पर दर्ज मुकदमों को लेकर भी है। उनका कहना है कि उनकी समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय उन पर कानूनी कार्रवाई की गई, जिसने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया। यही वजह है कि कर्मचारियों ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया है कि जब तक मुकदमे वापस नहीं लिए जाते और वेतन संबंधी मांगों पर ठोस फैसला नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
अब प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ शहर को गंदगी और संभावित स्वास्थ्य संकट से बचाना है, तो दूसरी ओर उन कर्मचारियों की आवाज भी सुननी है जो वर्षों से सफाई व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। अगर जल्द कोई रास्ता नहीं निकला, तो कूड़े के बढ़ते ढेर केवल सड़कों को ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी बड़े सवाल खड़े कर देंगे। यह सिर्फ वेतन का विवाद नहीं, बल्कि उन मेहनतकश हाथों की पुकार है जो शहर को साफ रखते हैं, लेकिन आज खुद इंसाफ और सम्मान की तलाश में खड़े हैं।