बरेली का बिजली-विहीन मेडिकल कॉलेज, 125 करोड़ का प्रोजेक्ट, लेकिन करंट नहीं!...
बरेली। उत्तर प्रदेश का तीसरा यूनानी मेडिकल कॉलेज बन तो गया। मगर, बिजली की रोशनी से अब भी महरूम है। 125 करोड़ रुपये खर्च हो गए, शानदार बहुमंजिला हॉस्टल खड़े हो गए। लेकिन एक अदद पावर कनेक्शन के लिए पूरा सिस्टम ठप है। ठेकेदारों ने अपने मनमुताबिक काम कर लिया। अफसरों ने अपनी फाइलें चला दीं और जब मेडिकल कॉलेज में करंट दौड़ाने की बारी आई तो पूरा मामला शून्य में झूलता नजर आया।
बिना प्लानिंग का बिजली उपकेंद्र, अब टेंपरेरी कनेक्शन से काम चलाओ
योजना बनाने वालों की मेहरबानी’ देखिए 33 केवी का बिजली उपकेंद्र बना दिया। लेकिन कनेक्शन कहां से आएगा ये सोचा ही नहीं। जब मामला सरकार तक पहुंचा तो लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने पल्ला झाड़ लिया और बिजली विभाग के सिर ठीकरा फोड़ दिया। फिर बिजली विभाग ने 6.50 करोड़ रुपये का एस्टीमेट दिया। लेकिन उतना बजट ही नहीं था। आखिरकार अस्थाई तौर पर सिर्फ 100 किलोवाट का कनेक्शन लिया गया। जबकि मेडिकल कॉलेज के लिए 2000 किलोवाट की जरूरत है। यानी अस्पताल का सिस्टम लो पावर मोड में ही चल रहा है।
टेंडर तो निकला, पर ठेकेदारों ने झंडा गाड़ दिया
बिजली विभाग ने जैसे-तैसे टेंडर निकाला कि कोई तो आए और अंधेरे से निकालने का रास्ता बनाए। मगर, ठेकेदारों ने भी इस बिजली संकट में हाथ डालने से मना कर दिया। बुधवार को निविदाएं खोली जानी थीं लेकिन कोई भी ठेकेदार आगे नहीं आया। अब विभाग टेंडर की तारीख बढ़ाने की सोच रहा है ताकि कोई बिजली का मसीहा इस योजना को रोशनी दे सके।
निदेशक ने दिखाई सख्ती, पर जवाबदार शॉक्ड
इस लापरवाही पर निदेशक आयुर्वेद सेवाएं मानवेंद्र सिंह का पारा हाई हो गया है। उन्होंने पूछा जब इतना बड़ा प्रोजेक्ट प्लान किया गया, तो बिजली का इंतजाम पहले क्यों नहीं किया गया? जवाब में संबंधित विभाग साइलेंट मोड में चला गया।
मेडिकल कॉलेज या सरकारी धांधली का स्मारक
बरेली का यह यूनानी मेडिकल कॉलेज एक उदाहरण बन गया है कि कैसे सरकारी सिस्टम की लापरवाही किसी भी प्रोजेक्ट को ब्लैकआउट में डाल सकती है। 125 करोड़ खर्च होने के बाद भी ये कॉलेज अभी आधा-अधूरा है। सवाल उठता है क्या अफसरों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी तय होगी। या फिर ये प्रोजेक्ट भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।