हल्की आंधी पानी ने बिजली व्यवस्था की खुली पोल, शहर लेकर ग्रामीण तक अंधेरे में, जिम्मेदार अधिकारी लापरवाह

हल्की आंधी पानी ने बिजली व्यवस्था की खुली पोल, शहर लेकर ग्रामीण तक अंधेरे में, जिम्मेदार अधिकारी लापरवाह
HIGHLIGHTS:

1. मेंटेनेंस के नाम पर करोड़ों फूंकने वाले बिजली विभाग की नाकामी से जनता बेहाल, धरनों-कलहों में उलझा सिस्टम
2. 33 केवी लाइनें बनीं जनता के गले की फांस, अफसरों की 'मौज-मस्ती' में झुलस रही जनता

Bareilly News: बिजली विभाग की लापरवाही ने एक बार फिर जनता को अंधेरे में धकेल दिया है। रविवार की हल्की सी आंधी और छींटे भर बारिश ने पूरे शहर की बिजली व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। आलम यह रहा कि एक-एक कर तमाम बिजली घर ठप पड़ते गए, और पूरा जिला बिजली संकट में घिर गया। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर सर्दियों में मेंटेनेंस के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों रुपये कहां गए? क्यों विभाग की तैयारियों की पोल आंधी में खुल गई?
यह न तो पहली बार है और न ही आखिरी, जब जनता ने बिजली विभाग की नाकामियों की कीमत भुगती है। हर बार की तरह इस बार भी विभाग के अफसरों की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता सामने आ गई। जब शहर में बिजली गुल थी, तब न तो जिम्मेदार अधिकारी अपने ऑफिस में थे और न ही कोई फील्ड पर नजर आया। बल्कि, ज्यादातर अधिकारी ‘संडे आउटिंग’ के मूड में थे और संविदा कर्मियों से लेकर जूनियर इंजीनियर तक धरने पर बैठे थे। सवाल ये है कि जब पूरा विभाग ही या तो छुट्टी पर है या धरने पर, तो फिर बिजली व्यवस्था संभाले कौन?हर साल गर्मियों से पहले विभाग करोड़ों का बजट मेंटेनेंस के नाम पर खर्च करता है। ट्रांसफॉर्मर बदले जाते हैं, लाइनों की रिपेयरिंग दिखाई जाती है, फीडरों की सफाई होती है। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। जैसे ही हल्की गर्मी शुरू होती है, 33 केवी की लाइनें फेल हो जाती हैं, ट्रिपिंग शुरू हो जाती है, और एक-एक कर सब स्टेशन बैठने लगते हैं।बीते दिन की घटना ने साबित कर दिया कि यह मेंटेनेंस महज कागजों में होता है। असल में न तो कोई तैयारी की जाती है, न ही किसी सिस्टम को दुरुस्त किया जाता है। यही वजह है कि शहर समेत ग्रामीण क्षेत्र घंटों तक बिजली से वंचित रहे और लोग मोबाइल की फ्लैश लाइट में काम चलाते रहे।

धरने पर बैठा स्टाफ, शहर अंधेरे में

जिले का दुर्भाग्य देखिए कि जब शहर की बिजली व्यवस्था पटरी से उतर चुकी थी, उसी समय विभाग के जूनियर इंजीनियर और संविदा कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे। इससे साफ होता है कि विभाग के भीतर किस कदर आंतरिक कलह है। एक तरफ तकनीकी स्टाफ प्रदर्शन कर रहा है, दूसरी तरफ अधिकारी अपनी मौज में हैं। ऐसे में व्यवस्थाएं संभलें भी तो कैसे?यह हड़ताल न सिर्फ जनता को बिजली से महरूम कर रही है, बल्कि राजस्व को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। लेकिन विभाग के अफसरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें तो सिर्फ अपनी गाड़ी, बंगला और ठंडी हवा में बैठने की चिंता है, जनता बिजली में झुलसे या अंधेरे में रहे — इससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं।
33 केवी लाइन: सबसे बड़ा सिरदर्द बिजली आपूर्ति में सबसे बड़ा संकट 33 केवी की लाइनों से जुड़ा है। हर दूसरी रात कोई न कोई लाइन फॉल्ट कर जाती है। सबसे हैरानी की बात ये है कि जब भी शिकायत की जाती है, तो अधिशासी अभियंता और एसडीओ स्तर के अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। फॉल्ट कहां है, क्यों हुआ, कितनी देर लगेगी — इसका कोई जवाब नहीं होता। यहां तक कि लाइनमैनों को भी बिना संसाधनों के भेज दिया जाता है, जिससे समस्या के समाधान में और देर होती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा अगर कोई पीड़ित है तो वह है आम जनता। बच्चों की पढ़ाई चौपट, मरीजों की दिक्कतें बढ़ीं, व्यापारी वर्ग का धंधा चौपट हुआ — लेकिन बिजली विभाग के अधिकारी अपनी गाड़ियों में घूमते रहे। शहर के कई हिस्सों में घंटों बिजली नहीं रही। लोग बार-बार हेल्पलाइन नंबर डायल करते रहे, लेकिन किसी ने कॉल उठाना जरूरी नहीं समझा।