विकास की चमक में दम तोड़ती नदियाँ
स्मार्ट सिटी बरेली की नदियाँ गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं। केमिकल, सीवर और औद्योगिक कचरे से पानी जहरीला हो चुका है, लेकिन प्रदूषण विभाग की खामोशी हालात को और खतरनाक बना रही है।
➡️ स्मार्ट सिटी बरेली की नदियाँ गंभीर प्रदूषण की चपेट में
➡️ केमिकल, डिटर्जेंट और औद्योगिक कचरे से पानी जहरीला
➡️ त्वचा रोग और संक्रमण का बढ़ता खतरा
➡️ भूजल और हैंडपंप का पानी भी हो रहा दूषित
➡️ प्रदूषण विभाग की चुप्पी पर गंभीर सवाल
➡️ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर मंडराता संकट
डेस्क/ जन माध्यम
बरेली। जिस पानी को जीवन कहा गया, वही आज ज़हर बनकर शहर की रगों में दौड़ रहा है। स्मार्ट सिटी का तमगा लगाए यह शहर अपनी नदियों के हाल पर शर्मिंदा है। कभी जिन घाटों पर हँसी गूंजती थी, जहाँ बच्चे पानी में छपाछप खेलते थे और बुज़ुर्ग सुकून की सांस लेते थे, आज वहाँ बदबू, झाग और काले रसायनों की मोटी परत तैर रही है। पानी इतना जहरीला हो चुका है कि नहाना तो दूर, उसे छूने भर से त्वचा झुलसने, जलन और गंभीर संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है।
नदियों में आज जीवन नहीं, बल्कि कॉस्मेटिक, डिटर्जेंट, केमिकल डाई और फैक्ट्रियों के रासायनिक कचरे का घातक सैलाब बह रहा है। सीवर की गंदगी और औद्योगिक अपशिष्ट बिना रोक टोक नदियों में छोड़ा जा रहा है। पानी की सतह पर झाग, तीखी बदबू और कालेपन की रेखाएँ चीख चीखकर बता रही हैं कि यह सिर्फ प्रदूषण नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पर्यावरणीय हत्या है। सवाल यह है कि सब कुछ खुलेआम होने के बावजूद प्रदूषण विभाग आखिर देख क्या रहा है?
स्थानीय लोगों का दर्द अब शब्दों में नहीं समाता। जिन घरों की खिड़कियाँ नदी की ओर खुलती थीं, आज वही लोग दरवाज़े बंद रखने को मजबूर हैं। नदी किनारे रहने वाले परिवारों में त्वचा रोग तेजी से बढ़े हैं,खुजली, दाने, फोड़े, फंगल इंफेक्शन और एलर्जी आम हो गई है। बच्चे पानी से दूर कर दिए गए हैं, मानो नदी नहीं, कोई ज़हरीला नाला बह रहा हो। यह हालात किसी एक दिन की देन नहीं, बल्कि वर्षों की लापरवाही और प्रदूषण विभाग लापरवाही का नतीजा है, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह पानी न सिर्फ स्नान, बल्कि छूने और सिंचाई तक के लिए असुरक्षित हो चुका है। रसायन त्वचा के रोमछिद्रों से शरीर में प्रवेश कर गंभीर बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर साफ कह रहे हैं कि लंबे समय तक इस पानी के संपर्क में रहने से स्किन कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इससे भी डरावनी सच्चाई यह है कि नदियों के आसपास का भूजल भी दूषित हो रहा है, यानी हैंडपंप का पानी भी सुरक्षित नहीं बचा।
सबसे बड़ा सवाल प्रदूषण विभाग की भूमिका पर है। नियम, मानक और निगरानी सिर्फ कागज़ों तक सीमित क्यों हैं? फैक्ट्रियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? नालों और सीवर को नदियों से जोड़ने वालों पर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जाती? स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं, लेकिन नदियों को ज़हर से बचाने के लिए इच्छाशक्ति क्यों गायब है?
आज यह नदियाँ सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि शहर के भविष्य का आईना हैं। अगर अब भी आंखें नहीं खुलीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी। स्मार्ट सिटी की असली पहचान ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि स्वच्छ नदियों और सुरक्षित पर्यावरण से होती है। प्रदूषण विभाग को अब कागज़ी कार्रवाई से बाहर निकलकर ज़मीन पर उतरना होगा, वरना यह ज़हर सिर्फ नदियों में नहीं, पूरे शहर की सांसों में घुल जाएगा।