शहीदी दिवस पर विशेष: "इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!" के नारों के साथ फांसी पर चढ़े भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
1. ब्रिटिश हुकूमत की हिला दी थीं जड़ें
2.प्रसिद्ध अधिवक्ता आसफ अली ने अंतिम समय तक जान बचाने की कोशिश
मुहम्मद साजिद (वरिष्ठ पत्रकार हैं)
23 मार्च 1931, यह वह दिन था जब भारत के तीन अमर क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश हुकूमत ने फाँसी पर चढ़ा दिया। उनके बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक गति दी और उन्हें हमेशा के लिए देश की स्मृतियों में अमर कर दिया। 1928 में ब्रिटिश पुलिस अफसर जॉन सॉन्डर्स की हत्या के आरोप में जंग-ए- आजादी के नायक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गिरफ्तार किया गया था। यह हत्या लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज का बदला लेने के लिए की गई थी। इसमें उनकी मृत्यु हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने इसे बड़ी साजिश करार देते हुए इन तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर षड्यंत्र केस में दोषी ठहराया और 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फाँसी की सजा सुना दी।
प्रसिद्ध वकील आसफ अली ने अंतिम समय तक की जान बचाने की कोशिश
भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए प्रसिद्ध अधिवक्ता आसफ अली ने पूरी कोशिश की। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ी और अपील की, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया। यहाँ तक कि गाँधीजी ने भी लॉर्ड इरविन से तीनों क्रांतिकारियों की सजा माफ करने की अपील की थी, लेकिन अंग्रेजों ने उनकी भी बात नहीं मानी।
हिंदुस्तान के इतिहास में 23 मार्च काला दिन
23 मार्च 1931 को निर्धारित समय से पहले ही शाम 7:30 बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई। जब जेल के अधिकारियों ने उन्हें फाँसी के तख्ते की ओर ले जाना चाहा, तो वे मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और नारे लगाने लगे। उन्होंने "इंकलाब जिंदाबाद!" "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!" नारे लगाए। भगत सिंह की अंतिम इच्छा थी कि उन्हें गोली से मारा जाए, लेकिन अंग्रेजों ने यह नहीं माना। फाँसी से पहले उन्होंने कहा था। उनका ब्रिटिश हुकूमत को पैगाम था कि "तुम्हें लगता है कि तुम हमें खत्म कर दोगे, लेकिन हमारी आवाज़ें तुम्हारी सल्तनत को हिला देंगी।"
गुपचुप किया शवों का दाह संस्कार
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गोपनीय तरीके से फाँसी दी गई और अंग्रेजों ने डर के कारण उनके शव परिवार को सौंपने के बजाय चुपचाप फिरोज़पुर के हुसैनीवाला में जलाने की कोशिश की। यह खबर जब फैली, तो लोग वहाँ इकट्ठा हो गए और अधजले शवों को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार दिया।
शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है यह दिन
आज, 23 मार्च को "शहीद दिवस" के रूप में मनाया जाता है। भगत सिंह का बलिदान केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बना। उनका विचार, उनकी लिखी किताबें और उनके आदर्श आज भी युवाओं को देशभक्ति और न्याय की राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं। "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है!"बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन के महामंत्री संजीव मेहरोत्रा समेत देश भर में शहीद दिवस पर जंग ए आजादी के नायकों को याद किया गया है।