लाड़ खां ने मंदिर को रोशन किया था
कर्नाटक के एहोल शिव मंदिर का जीर्णोद्धार सैयद जलालुद्दीन लाड़ खां ने कराया, अकबर के बहादुर मंसबदार की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल आज भी जीवित।
➡️ अकबर के मुस्लिम मंसबदार लाड़ खां ने कराया एहोल शिव मंदिर का जीर्णोद्धार
➡️ टूटे मंदिर को देखकर दिया वचन, विजय के बाद पूरा किया
➡️ अपना खर्च उठाया, वंशजों ने सदियों तक परंपरा निभाई
➡️ मालवा फतह के बाद मिला ‘लाड़ खां’ खिताब, दिलों की फतह पहले ही कर चुके थे
➡️ 1857 तक जागीर से मंदिर को हिस्सा, आज भी मंदिर में जिंदा है उनकी याद
➡️ गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे खूबसूरत अध्या
एहोल शिव मंदिर का जीर्णोद्धार सैयद जलालुद्दीन लाड़ खां ने कराया
जन माध्यम
सेंथल,बरेली। सेंथल का इतिहास सिर्फ़ जंगों और फतहों से नहीं लिखा जाता, कुछ नाम ऐसे भी होते हैं जो इंसानियत, सम्मान और तहज़ीब की मिसाल बनकर सदियों तक जिंदा रहते हैं। सैयद जलालुद्दीन लाड़ खां बारहा ऐसा ही एक नाम हैं जो सिर्फ़ अकबर के दौर के बहादुर मंसबदार नहीं थे, बल्कि वो दिलों को जीतने वाले, धर्म और मानवता की कद्र करने वाले एक सच्चे रौशन इंसान थे।मुज़फ्फरनगर के सम्भलेड़ा गांव से निकले इस बहादुर ने तलवार की धार पर जितनी जीतें दर्ज कीं, उससे कहीं बड़ी जीत उन्होंने दिलों पर हासिल की। मालवा की फतह के बाद जब अकबर ने उन्हें पांच परगनों की जागीर और लाड़ खां का ख़िताब दिया, तो यह सिर्फ़ उनकी बहादुरी का नहीं, बल्कि उनके चरित्र के उजाले का सम्मान था। यही वजह है कि आज भी बरेली, पीलीभीत और आसपास के जिलों में जलालपुर और लाड़पुर के गांव उनका नाम लिए खड़े हैं। दक्षिण भारत की मुहिम पर जाते हुए जब उनका काफ़िला कर्नाटक के एहोल में रुका, तो इतिहास ने करवट ली। वहां उन्होंने एक टूटे बिखरे शिव मंदिर को देखा मिट्टी से भरी मूर्ति, टूटे स्तंभ, और स्थानीय लोगों की आँखों में असहाय आस्था। पुजारियों की काँपती आवाज़ ने उन्हें रोक लिया। एक मुस्लिम मंसबदार ने उस क्षण बिना कुछ सोचे कहा जब फतह लौटकर आऊँगा, यह मंदिर दोबारा जी उठेगा ये मेरा वादा है।और वो वादा निभाया गया। अकबर की विजय के बाद सैयद लाड़ खां ने अपने खर्च से उस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। यह सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि गंगा जमुनी तहज़ीब का सबसे खूबसूरत अध्याय बन गया। मंदिर उनका नाम लेकर लाड़ खां मंदिर कहलाने लगा जहां धर्म, सम्मान और इंसानियत एक साथ सिर उठाकर खड़ी होती है।
उनके वंशज वर्षों तक अपनी जागीर का हिस्सा मंदिर को भेजते रहे। 1857 के विद्रोह के बाद जब जागीर अंग्रेजों ने छीन ली, तो यह परंपरा टूट गई। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती मीर मोहम्मद ज़फ़र साहब ने बाद में मोहन मंदिर बनवाकर फिर साबित कर दिया कि सैयद लाड़ खां की विरासत सिर्फ़ इतिहास में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में रहती है।