बेसिक शिक्षा कल्याण समिति की बैठक में प्राइवेट स्कूलों का 'कल्याण', अभिभावकों की लूट पर खामोशी

बरेली में बेसिक शिक्षा कल्याण समिति की बैठक में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर सवाल उठे, लेकिन किताब-ड्रेस की लूट और कमीशनखोरी पर पदाधिकारी चुप्पी साधे रहे।

बेसिक शिक्षा कल्याण समिति की बैठक में प्राइवेट स्कूलों का 'कल्याण', अभिभावकों की लूट पर खामोशी
HIGHLIGHTS:

➡️ शिक्षा समिति की बैठक में प्राइवेट स्कूलों का ‘कल्याण’
➡️ किताब-ड्रेस की जबरन बिक्री पर सवाल, जवाब गायब
➡️ अभिभावकों की लूट पर समिति की चुप्पी
➡️ खास दुकानों से खरीदने का दबाव, महंगे दाम

हसीन दानिश / जनमाध्यम 
बरेली।
बेसिक शिक्षा कल्याण समिति की हालिया बैठक एक बार फिर शिक्षा के नाम पर चल रही खुली लूट का पर्दाफाश करने वाली साबित हुई। बैठक में प्राइवेट स्कूल संचालकों के तथाकथित कल्याण पर जमकर चर्चा हुई, लेकिन जब पत्रकारों ने असली सवाल उठाए प्राइवेट स्कूलों की किताबें सिर्फ किसी खास दुकान पर ही क्यों उपलब्ध होती हैं? और ड्रेस स्कूल से ही लेने का दबाव क्यों बनाया जाता है? तो समिति के प्रदेश अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी सवालों से बचते नजर आए। उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट जवाब देने से साफ तौर पर किनारा कर लिया।

यह घटना उत्तर प्रदेश में शिक्षा माफिया की उस गिरोहबंदी को उजागर करती है, जहां प्राइवेट स्कूल संचालक अभिभावकों को किताबें, कॉपी, स्टेशनरी और स्कूल ड्रेस खरीदने के लिए खास दुकानों या अपनी ही काउंटर पर मजबूर करते हैं। बाजार में उपलब्ध सामान से कई गुना महंगी ये चीजें बेची जाती हैं, और कमीशन के चक्कर में स्कूल प्रबंधन और दुकानदार मिलकर अभिभावकों की जेब काटते हैं।

ऐसे मामलों में अभिभावकों की शिकायतें आम हैं कि स्कूल से निकालने की धमकी,परीक्षा में न बैठने का दबाव और बच्चों पर मानसिक प्रताड़ना।

देश के कई राज्यों में प्रशासन ने ऐसी मनमानी पर सख्ती बरती है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्यों में शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि किसी विशेष दुकान से किताब-ड्रेस खरीदने का दबाव नहीं बनाया जाएगा, स्कूल परिसर में बिक्री नहीं होगी और एनसीईआरटी/एससीईआरटी किताबें ही अनिवार्य होंगी। लेकिन उत्तर प्रदेश में शिक्षा माफिया के आगे सरकारी तंत्र अब तक बेबस नजर आता है।

प्रदेश अध्यक्ष की चुप्पी सवाल खड़े करती है

बैठक में मौजूद पत्रकारों के तीखे सवालों पर समिति के प्रदेश अध्यक्ष का जवाब देना तो दूर, वे इस मुद्दे पर बोलने से ही बचते दिखे। यह स्पष्ट संकेत है कि समिति का असली उद्देश्य प्राइवेट स्कूलों के हितों की रक्षा करना है, न कि अभिभावकों और छात्रों के। शिक्षा के नाम पर यह खुली लूट कब तक चलेगी? प्राइवेट स्कूलों में किताब-ड्रेस की बिक्री पर तत्काल रोक लगे, विशेष दुकानों के जरिए कमीशनखोरी की जांच हो, दोषी स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई की जाए और अभिभावकों को बाजार से स्वतंत्र रूप से सामग्री खरीदने की पूरी छूट मिले।

शिक्षा माफिया के इस जाल को तोड़ने की जरूरत है। अगर समिति और प्रशासन अब भी चुप रहे, तो यह साफ हो जाएगा कि शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि मुनाफे का धंधा बन चुकी है। अभिभावक संगठनों और जनता से अपील है कि इस मुद्दे पर आवाज उठाएं, ताकि आने वाली पीढ़ी इस लूट से बच सकें। आखिर बेसिक शिक्षा कल्याण समिति शिक्षा के हक में खड़ी है - शिक्षा माफिया के खिलाफ।