ड्रग इंस्पेक्टर की मनमानी का शासन

बरेली में ड्रग इंस्पेक्टर की मनमानी चरम पर: पसंद की दुकानें खुली, नापसंद का लाइसेंस सस्पेंड, बुजुर्ग व्यापारी खंडूजा की सेहत बिगड़ी।

ड्रग इंस्पेक्टर की मनमानी का शासन
HIGHLIGHTS:

➡️ ड्रग इंस्पेक्टर की मर्जी, मतलब कानून की मर्जी
➡️ पसंद की दुकानें खुली, नापसंद का लाइसेंस सस्पेंड
➡️ 65 साल के खंडूजा को धमकी से बीमार किया
➡️ 20 से ज़्यादा दुकानों की जांच 4 महीने से लंबित
➡️ गुनीना फार्मा पर कोई कार्रवाई नहीं
➡️ सीएम पोर्टल पर शिकायत, अब इंस्पेक्टर राज पर सवाल

कानून की नहीं, ड्रग इंस्पेक्टर की मर्जी से चलेगी दुकानों की किस्मत

जन माध्यम 
बरेली।
योगी सरकार में हर मंच से इंस्पेक्टर राज खत्म करने के दावे कितने भी जोर-शोर से किए जाएँ, हकीकत कुछ और ही है। बरेली में ड्रग विभाग ने यह तय कर लिया है कि कानून की बजाय अब इंस्पेक्टर की मर्जी ही दवाओं के कारोबार की चाल तय करेगी। किसकी मेडिकल दुकान खुलेगी, किसका बंद, किसके लाइसेंस पर ताला लगेगा और कौन सुरक्षित रहेगा सबकुछ व्यक्तिगत पसंद नापसंद के आधार पर। यह सिर्फ नियमों की विफलता नहीं, बल्कि सरकारी प्रणाली में व्याप्त मनमानी और भ्रष्टाचार की सजीव तस्वीर है।मनोज कुमार खंडूजा, जिनका 30 वर्षों का ईमानदार कारोबार रहा है, ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई है। उनके अनुसार, बिना किसी सुनवाई या पूरी जांच के ड्रग विभाग ने उनके लाइसेंस को 30 दिन के लिए निलंबित कर दिया। खंडूजा ने सभी जरूरी दस्तावेज क्रय-विक्रय बिल, बैंक भुगतान और जीएसटी रिकॉर्ड सपष्ट रूप से जमा किए। इसके बावजूद विभाग ने उन्हें थोप दिया, और साथ ही उनके ग्राहकों को धमकाकर उनकी प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुँचाई।विभागीय कार्रवाई में स्पष्ट दोहरे मानक देखे जा रहे हैं। तीन दुकानों के लाइसेंस निलंबित किए गए, लेकिन गुनीना फार्मास्यूटिकल्स, जिनसे कथित घनिष्ठता है, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाकी दुकानदारों के लिए कानून का पैमाना बदल दिया गया है। चार महीने से अधिक समय से 20 से अधिक मेडिकल स्टोरों की जांच लंबित है, पर कार्रवाई केवल तीन पर हुई। व्यापारियों का आरोप है कि जिनसे विभाग खुश है, उनकी फाइलें ठंडी पड़ी हैं; जिनसे नाराज, उनके लाइसेंस निलंबित।
65 वर्ष के बुजुर्ग व्यापारी खंडूजा ने बताया कि सहायक आयुक्त औषधि की धमकियों और शोषण की वजह से उनकी सेहत बिगड़ गई। सवाल उठता है क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत मनमानी है या सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार की चेतावनी? सहायक आयुक्त औषधि संदीप कुमार चौधरी कहते हैं कि कार्रवाई केवल इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर होती है, लेकिन जब इंस्पेक्टर राज का दखल इतना गहरा हो, तो निष्पक्षता और कानून की ताकत पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?यह मामला केवल एक व्यापारी की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे बरेली के दवा कारोबार की न्याय और पारदर्शिता पर उठती चिंता है। अगर नियम नहीं, इंस्पेक्टर की मर्जी कानून बन गई है, तो आम नागरिक और ईमानदार व्यापारी किस पर भरोसा करें? विभाग की मनमानी और व्यक्तिगत पसंद नापसंद के इस खेल में जिम्मेदारी केवल उन अधिकारियों की होगी, जो कानून को अपने स्वार्थ के तहत मोड़ देते हैं। इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि बरेली में ड्रग विभाग अब नियमों का पालन नहीं, बल्कि अपने इंस्पेक्टर राज की छाया में कारोबार चला रहा है। समय है कि सीएम पोर्टल और उच्च अधिकारियों तक यह पीड़ा पहुंचे, ताकि कानून की विजय और आम व्यापारी की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।