सर्द रातों में बुझती रौशनी 

बरेली में सर्दियों की लंबी रातों में 33 केवी और 11 केवी लाइनों के फॉल्ट से 5-10 घंटे बिजली गायब, शहर अंधेरे में डूबा। रोज 6-7 घंटे कटौती से बच्चे-बुजुर्ग कांपे, चोरी-छिनैती का डर बढ़ा। बिजली विभाग की लापरवाही पर सवाल, गर्मियों का संकट डरावना।

सर्द रातों में बुझती रौशनी 
HIGHLIGHTS:

➡️ बरेली: 33-11 केवी फॉल्ट से 5-10 घंटे अंधेरा, सर्दी सजा बनी।
➡️ रोज 6-7 घंटे कटौती: बच्चे-बुजुर्ग ठंडे कांपे, बीमार जोखिम।
➡️ अंधेरे में चोरी-छिनैती का डर बुलंद।
➡️ विभाग लापरवाही: मेंटेनेंस कागजों तक सीमित।
➡️ सर्दी में यह हाल, गर्मी संकट डरावना; इंसाफ मांग।

33 केवी और 11 केवी लाइन फॉल्ट से 5–10 घंटे अंधेरे में डूबा शहर, 

डेस्क/ जन माध्यम
बरेली। सर्दियों की लंबी रातें यूं ही कठिन होती हैं, लेकिन जब अंधेरा प्रशासनिक बेरुखी से जुड़ जाए, तो वह रात नहीं, एक सजा बन जाती है। शहर इन दिनों ऐसी ही सजा भुगत रहा है। जिस मौसम में बिजली सुकून बननी चाहिए थी, उसी मौसम में बिजली विभाग की नाकामी ने शहर को अंधेरे और डर के हवाले कर दिया है। 33 केवी और 11 केवी दोनों लाइनों के एक साथ फॉल्ट होने से कई इलाकों में 5 से 10 घंटे तक बिजली गायब रही। घरों में रौशनी बुझी, लेकिन विभाग के जिम्मेदारों की आंखें नहीं खुलीं।
अंधेरे में डूबी गलियों में सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक खामोश डर था किसी अनहोनी का, किसी हादसे का। बच्चे किताबें बंद कर टॉर्च तलाशते रहे, बुजुर्ग ठंड से कांपते हुए हर आहट पर चौकन्ने हो गए। बीमारों के लिए यह अंधेरा और भी भयावह था, जहां एक पल की बिजली कटौती भी जान पर भारी पड़ सकती है। लेकिन बिजली विभाग के पास न कोई संवेदना थी, न कोई जवाब। विडंबना देखिए कि वही विभाग आरडीएस योजना और स्मार्ट सिस्टम के नाम पर शहर को चमकाने के दावे करता है। कागजों में सब कुछ दुरुस्त है, लेकिन हकीकत में सर्दियों में भी रोजाना 6 से 7 घंटे बिजली कटौती आम हो चुकी है। लोग पूछ रहे हैं अगर ठंड में यह हाल है, तो गर्मियों की तपिश में शहर कैसे जिएगा? यह सवाल अब शिकायत नहीं, एक डर बन चुका है।
हर घर में परेशानी की एक कहानी है। कहीं मोमबत्ती की रौशनी में पढ़ता बच्चा है, कहीं ठंड में बिना हीटर के बैठा बुजुर्ग, तो कहीं बिजली के इंतजार में बेचैन मरीज। फ्रिज बंद हैं, पानी ठंडा है और दिलों में आक्रोश उबल रहा है। हर गली में एक ही सवाल गूंज रहा है,बिजली कब आएगी? स्मार्ट वर्टिकल सिस्टम की बात करने वाला बिजली विभाग आज खुद अपनी विफलताओं के अंधेरे में खो गया है। जब से शहर में स्मार्ट अधीक्षण अभियंता ने कार्यभार संभाला है, हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते चले गए। 33 केवी हो या 11 केवी, फॉल्ट अब दुर्घटना नहीं, रोजमर्रा की नियति बन चुके हैं। मेंटेनेंस कागजों में होता है, जमीन पर नहीं। सबसे डरावनी बात यह है कि अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। चोरी, छिनैती और डकैती का खतरा हर रात लोगों की नींद छीन रहा है। लेकिन बिजली विभाग को न जनता की सुरक्षा की चिंता है, न शहर की कानून-व्यवस्था की। अफसरों के घरों में रौशनी है, इसलिए शायद उन्हें अंधेरे का दर्द समझ नहीं आता। आज शहर सिर्फ बिजली नहीं मांग रहा, वह सम्मान और सुरक्षा मांग रहा है। बिजली विभाग की लापरवाही ने जनता का भरोसा तोड़ दिया है। अगर सर्दियों में ही हालात इतने अमानवीय हैं, तो गर्मियों में यह संकट किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। अब भी वक्त है,उच्च अधिकारी जागें, जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाए और शहर को अंधेरे से नहीं, इंसाफ से रोशन किया जाए। वरना इतिहास गवाह रहेगा कि शहर अंधेरे में था और जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे थे।