बरेली में डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की जयंती मनाई गई, दलित-मुस्लिम एकता पर हुआ विचार-मंथन
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➡️ डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की जयंती पर गोष्ठी आयोजित
➡️ दलित-मुस्लिम एकता और सामाजिक चेतना पर चर्चा
➡️ मौजूदा हालात पर सरकार और सिस्टम की आलोचना
➡️ लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा का आह्वान
➡️ बड़ी संख्या में सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता मौजूद
हसीन दानिश/ जन माध्यम
बरेली। ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस के संस्थापक डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की जयंती पर गेस्ट हाउस कैथ का पेड़, सैलानी रोड पर आयोजित कार्यक्रम में मोहम्मद खलिक उर्फ बब्बू की अध्यक्षता हुई।
राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट वसी अहमद ने कहा कि डॉ. फरीदी ने 3 जून 1988 को मुस्लिम मजलिस की स्थापना की। उस समय दलित-मुस्लिमों में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए ज्योति बा फुले और पेरियार के विचारों का प्रचार किया गया। बाराबंकी उपचुनाव में नन्हे लाल कुरील को जिताकर दलित-मुस्लिम एकता स्थापित की गई। डॉ. फरीदी के असामयिक निधन से सपना अधूरा रह गया, लेकिन संगठन आज भी अल्पसंख्यक, दलित व पिछड़ों की लड़ाई लड़ने को तैयार है। वर्तमान में छुआछूत जैसी कुरीतियां बनी हुई हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास जारी है।
दिपेश भारती ने कहा कि वर्तमान सरकार अल्पसंख्यक व दलित-पिछड़ों का उत्पीड़न कर रही है। पुलिस निरंकुश हो गई है, मॉब लिंचिंग हो रही है और विधि-विरुद्ध भवन ध्वस्त किए जा रहे हैं।
जिलाध्यक्ष अतीक करम इदरीसी ने एसआईआर के जरिए वोट कम करने और कारपोरेट प्रभाव से बेरोजगारी बढ़ने की आशंका जताई। रामकुमार समदर्शी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जे और ईडी-सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए बड़े जन आंदोलन की जरूरत बताई।
कार्यक्रम में कासिम कशमीरी, चंद्र सेन भारती, प्रो. बी.एस. वर्मा, मजीद खां, खान मोवीन रिजवी, जमील अहमद (राज), हिना एडवोकेट, बिलाल करम आदि उपस्थित रहे।